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Thursday, March 10, 2016

जहाँ में आदमी भी आदमी लगता नहीं मुझको

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जहाँ में आदमी भी आदमी लगता नहीं मुझको,
यहाँ मुर्दा-परस्ती है खताएं कह रहीं मुझको |
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जो कहते हैं ज़रा देखो कहीं काँटा न चुभ जाये,
रुपहली साजिशें छलके ले जाएँ फिर कहीं मुझको |

कहें वो बे-इरादा है और उनका इस तरह आना,
कहूँ क्या खाकदाँ से अब लगे अच्छा नहीं मुझको |

निगाह-ए-जुर्म का पर्दे में धीरे से चले आना ,
खुदा से इल्तिजा छाये न वहशीपन यहीं मुझको |

किसी की चाप का जलते ख्यालों में चले आना,
नहीं जुर्रत किसी गिद्द की जो छेड़ेगा कहीं मुझको |

हर्ष महाजन

खाकदाँ= संसार
bahr 1222 1222 1222 1222