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Friday, May 27, 2016

तू देख खुदा ऐसा कहीं मंज़र न मिलेगा,




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तू देख खुदा ऐसा कहीं मंज़र न मिलेगा,
अब कातिलों के शहर में खंज़र न मिलेगा |

अब देखो तुम ऐसा कहीं मंज़र न मिलेगा,
इन कातिलों के शहर में खंज़र न मिलेगा ।

आँखों से बहते अश्क भी अब सोचते हैं ये
ढूंढेंगे ऐसा घर भी तो ये घर न मिलेगा ।

ढूंढें कोई गमख्वार अब गैरों के शहर में,
दुश्मन तो मिलेगा मगर रहबर न मिलेगा ।

अब हो गया इन आंखों में दर्दों का ज़खीरा,
टूटेगा ऐसे अश्कों का समंदर न मिलेगा ।

हर्ष महाजन