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Wednesday, March 23, 2016

दुनियाँ है बदली बदली कुछ मैं भी बदल गया

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दुनियाँ है बदली-बदली कुछ मैं भी बदल गया,
इक दिल था जो इंसान में....जाने किधर गया ।

छोड़ा भँवर में उसने जब ताज्जुब तो तब हुआ,
जिसके लिए हर जंग में......मैं खुद उतर गया ।

पत्थर लिए अब घूमता......हर शख्स बदज़ुबां,
इंसान का इंसान से...........रिश्ता बिखर गया ।

यूँ हर तरफ आतंक और...........गुनाह देखकर,
इक जूझता इंसान मुझमें..........आज मर गया ।

दहशत भरे माहौल का........अब देखिये असर,
रौशन हुआ दीया तो समझे...घर ही जल गया ।

----------------------हर्ष महाजन

2212 2212 2212 12

Thursday, March 10, 2016

जहाँ में आदमी भी आदमी लगता नहीं मुझको

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जहाँ में आदमी भी आदमी लगता नहीं मुझको,
यहाँ मुर्दा-परस्ती है खताएं कह रहीं मुझको |
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जो कहते हैं ज़रा देखो कहीं काँटा न चुभ जाये,
रुपहली साजिशें छलके ले जाएँ फिर कहीं मुझको |

कहें वो बे-इरादा है और उनका इस तरह आना,
कहूँ क्या खाकदाँ से अब लगे अच्छा नहीं मुझको |

निगाह-ए-जुर्म का पर्दे में धीरे से चले आना ,
खुदा से इल्तिजा छाये न वहशीपन यहीं मुझको |

किसी की चाप का जलते ख्यालों में चले आना,
नहीं जुर्रत किसी गिद्द की जो छेड़ेगा कहीं मुझको |

हर्ष महाजन

खाकदाँ= संसार
bahr 1222 1222 1222 1222

Wednesday, March 9, 2016

यहाँ बहने लगीं, आतंक की, नदियाँ करीने से

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यहाँ बहने लगीं, आतंक की, नदियाँ करीने से,
लिखूँ आज़ाद किनको आये बदबू ख़ूँ-पसीने से |
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सियासी खेल में भूले हैं अस्मत लुट रही माँ की,
नहीं डरते लहू निकलेगा अपनों के ही सीने से |

जहाँ अखबार के कतरे भी जब सोने नहीं दे तो,
समझ लो उतरा हर माझी समंदर में सफीने से |

छिपे आतंक के आका सियासत के लिबासों मैं,
जुबां सच उगलेगी होंगे फिर बलवे हर कमीने से |

न है अब चैन सरहद पर शहर सोने से डरता है,
कभी लूटे हैं दुश्मन फिर कभी वो नामचीने से |

जहाँ शिर्कत करें लाखों आतंकी के ज़नाजे  पर,
करें उम्मीद क्यूँ फिर आज इक फौजी नगीने से |

हर्ष महाजन
बहर -
1222 1222 1222 1222

नामचीन = सुप्रसिद, नामवर, नामवाला

Friday, March 4, 2016

तेरे हिस्से की मैंने दिल में इक सौगात रक्खी है



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तेरे हिस्से की मैंने दिल में इक सौगात रक्खी है,
ज़रा आओ तो परदे में.......ज़मीं आज़ाद रक्खी है |

तेरे कूचे की मुझको......यादें क्यूँ जीने नहीं देतीं,
नज़र भर देख आँखों में वो शय आबाद रक्खी है |


मुहब्बत की हवेली ये.......इसे बीरान न कर तू ,
ये अपनी रूह भी, खातिर तेरे, बेज़ार रक्खी है |


अगर मुमकिन नहीं आना भुलाना भी नहीं वाजिब,
लबों से हंस के मैंने...जान भी कुर्बान रक्खी है |


इलाही सब्र का दामन.......कभी छोड़ा नहीं मैंने,
तेरी तस्वीर दिल में उस जगह बेदाग़ रक्खी है |


कभी आँखों से बहते अश्क भी भूला नहीं हूँ मैं,
खुदाया आना तू इक बार इक रुदाद रक्खी है | 


______हर्ष महाजन


1222 1222 1222 1222

जो दो दिल साथ रहते हैं मुहब्बत साथ चलती है

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जो दो दिल साथ रहते हैं मुहब्बत साथ चलती है,
वो रिश्ता तब संभलता हैं कि जब बारात चलती है |
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चलो इंसानियत की सब हदें हम पार भी कर लें,
ये धोखा यार को दें पर खुदा की मार चलती है |
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जो किस्मत में मुहब्बत है मचलना भी ज़रूरी है,
वो मचले गैर पर फिर दिल पे इक तलवार चलती है |
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यूँ आँखों से किसी का दिल में नीचे तक उतर जाना,
तो जीने मरने में दिल की न जीत-औ-हार चलती है |
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ज़मीने-हुस्न पर सदियों से तलवारें चलीं लेकिन,
मुहब्बत हीर-रांझे सी तो बारम्बार चलती है |
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हर्ष महाजन

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1222 1222 1222 1222

Wednesday, March 2, 2016

ये सदन अब ऎसी दुकां हुआ

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ये सदन अब ऎसी दुकां हुआ,
काफिरों का जमघट जहां हुआ |

है सियासी दाव न शर्म कोई,
सरफिरों का लगता मकां हुआ |


अब ज़बीं पे जिसके न दाग हो,
ये सदन अब कैसा जवां हुआ |


क्यूँ घुला है सांसदों में ज़हर,
जबकि वोटों से इम्तिहां हुआ | 


क्यूँ फलक ज़मी पे झुका दिया,
की ग़ज़ल में हिन्दोस्तां हुआ |


ये नतीजा अब.....बैर का नहीं,
देख क्या किसके दरमियाँ हुआ |


जो वतन से गर इश्क मर गया,
तो समझना गर्दिश समां हुआ |


सांसदों के हाथों....कमान देख,
हर बशर भी अब परीशां हुआ |


____हर्ष महाजन


बशर=आदमी
2122 2212 12