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Sunday, January 29, 2017

दिल को ऐसे ही सज़ा देता हूँ मैं

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दिल को ऐसे ही सज़ा देता हूँ मैं,
खत सभी उनके जला देता हूँ मैं ।

गर ग़ज़ल अच्छी लगे उनको कभी,
जल्द कागज़ से हटा देता हूँ मैं ।

आग जब दिल से कभी बुझने लगे,
सूखे ज़ख्मों को हवा देता हूँ मैं ।

जाने क्यूँ उनको दुआ दी मैंने आज,
बात जिनकी खुद भुला देता हूँ मैं ।

आज फिर ख़ूने ज़िगर जलता है क्यूँ,
आग जब दिल की बुझा देता हूँ मैं ।

चाह गर अखबार में सुर्खी बनूँ,
हादसा हो अब दुआ देता हूँ मैं ।

-----------–हर्ष महाजन

बहर
2122 - 2122 - 212
बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़

*आपके पहलू में आकर रो दिए
        *दिल के अरमां आंसुओं में बह गये
        *तुम न जाने किस जहाँ में खो गये |