Monday, January 31, 2022

अगर शोहरत यहाँ इंसान की बदनाम हो जाए

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अगर शोहरत यहाँ इंसान की बदनाम हो जाए,
तो हक में जो करोगे बात वो इल्जाम हो जाए  ।

मुझे ग़म ये नहीं मुझको यहाँ पढता नहीं कोई,
मेरी चाहत मेरा ये ग़म कोई सर-ए-आम हो जाए।

ये उसकी जुल्फों के सदके लिखें मैंने बहुत नग्में,
मगर हर बार देखो ये कलम नीलाम हो जाये ।

कभी तो चूम ले मुझको मेरे जज़्बात की खातिर,
न जाने किस घडी इस ज़िन्दगी की शाम हो जाए ।

मेरी चाहत के मैं दीया बनूँ और वो बने बाती ,
मगर डर है जमाने का न ये नाकाम हो जाए ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
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12 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 2 फरवरी 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
    !

    अथ स्वागतम् शुभ स्वागतम्

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    1. हार्दिक आभार पम्मी जी ।

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  2. मुझे ग़म ये नहीं मुझको यहाँ पढता नहीं कोई,
    मेरी चाहत मेरा ये ग़म कोई सर-ए-आम हो जाए।

    –वाह वाह
    बहुत खुशी हुई पढ़कर

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  3. Replies
    1. शुक्रिया मनीषा जी ।

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  4. अगर शोहरत यहाँ इंसान की बदनाम हो जाए,
    तो हक में जो करोगे बात वो इल्जाम हो जाए ।
    वाह , बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ।। हर शेर अपनी कहानी कहता हुआ ।

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    1. आदरनीय संगीता जी तहे दिल से धन्यवाद ।

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  5. कभी तो चूम ले मुझको मेरे जज़्बात की खातिर,
    न जाने किस घडी इस ज़िन्दगी की शाम हो जाए ।वाह!!!
    बहुत ही लाजवाब गजल।

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    1. पसंदंगी के लिए कोटि कोटि धन्यवाद

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  6. मेरी चाहत के मैं दीया बनूँ और वो बने बाती ,
    मगर डर है जमाने का न ये नाकाम हो जाए ।
    सुंदर शेर।

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    1. ज़र्रानावाज़ी का शुक्रिया आपका ।

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