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कितना था तंज उसके हर उठते सवाल में,
कुछ वो भी मुझसे तंग था कुछ मैं भी हाल में ।
चाहा जिसे वो शख्स था, मेरे ही ख्याल का,
वैसा नहीं था लुत्फ किसी के जमाल में ।
कैसे भी रंग दे दिल को, मुहब्बत के रंग से,
उम्रें गुजार दूँगा मैं फिर, देख भाल में।
नफरत मिटा सका न मैं, उसके मिजाज से
वाहिद मैं जी रहा हूँ उसी के मलाल में ।
कितना अलग था शख़्स वो, कितना था खुश-नशीं,
लेकिन मिला न कोई मुझे, उसकी मिसाल में ।
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मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
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