Monday, May 31, 2021

क्युं अपने सभी याद आने लगे हैं

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क्युं अपने सभी याद आने लगे हैं,

दिया दुश्मनी का जलाने लगे हैं ।


वो चुपके से सर रख के काँधे पे उनके,

वफ़ा नफ़रतों की बढ़ाने लगे हैं ।


हवाओँ में फिर आँधियों सी ख़बर है,

वो आइनों पे पत्थर चलाने लगे हैं ।


ये कैसे मुसलसल वो ऑंसू थमेंगे,

यूँ अपनों के ऐसे निशाने लगे हैं ।


दिया जब बुझा देखकर उनके घर का,

ख़बर थी महल को सजाने लगे हैं ।


बस्ती में अपनी नए ज़ख्म देखो,

वो गैरों को अपना बताने लगे हैं ।


कहूँ काल उनको या कर्मों का लेखा,

चिता से दिए वो जलाने लगे हैं ।


नहीं फ़ायदा बंदगी का ख़ुदा की ,

हवाओं से पुल वो बनाने लगे हैं।


ज़ुबाँ ज़ह्र उगलेगी इतना पता था,

ये किरदार सच में निभाने लगे हैं ।


-----हर्ष महाजन 'हर्ष'

Friday, May 21, 2021

हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो

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हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो,

अपने साहिल को भी तुम अपना बताना छोड़ दो ।


अर्थियों के संग भी अपना कोई दिखता नहीं,

आज से अपनों पे अपना हक जताना छोड़ दो ।


जब तलक दस्तक न दे वो दर्द तेरे द्वार पे,

ज़िन्दगी की खुशियों को यूँ ही गँवाना छोड़ दो ।


अस्पतालों से निकलती लाशों को देखो ज़रा,

कह रहीं हैं अपनों से नफ़रत बढ़ाना छोड़ दो ।


ज़िन्दगी में ऐसा मंज़र आएगा सोचा न था,

आदमी से 'हर्ष' अब मिलना मिलाना छोड़ दो ।


-------हर्ष महाजन 'हर्ष'

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Sunday, May 16, 2021

ये कैसा वार मेरे यार करके छोड़ दिया

 ये कैसा वार मेरे यार करके छोड़ दिया,

मेरा नसीब क्यूँ बीमार करके छोड़ दिया ।


अभी-अभी तो गुलों में बहार होने को थी,

हवा को किसने गिरफ़्तार करके छोड़ दिया ।


ढली है शाम-ओ-सहर औऱ उम्र भी पल में,

हुए ज़ुदा तो गुनाहगार करके छोड़ दिया ।


वो बेवफ़ा भी कहें मुझको ये कबूल सही,

मगर है रंज मुझे प्यार करके छोड़ दिया ।


ज़ुदा हुए तो हुए इसका तो है ग़म लेकिन,

है ग़म तो उसका कि गुल **खार करके छोड़ दिया ।


लगी क्या आँख जरा सी वफ़ा भी भूल गए,

मेरा वज़ूद यूँ मझधार करके छोड़ दिया ।


ज़मी भी थम सी गयी आसमाँ ठहर सा गया,

यूँ मेरी हस्ती को बेकार करके छोड़ दिया ।


जो कद्र करता रहा उम्र भर तेरी लेकिन,

उसी चराग़ को बेज़ार करके छोड़ दिया ।


तवाफ़* करता रहूँ तेरे इर्द गिर्द लेकिन,

ये आस पास क्यूँ दीवार करके छोड़ दिया ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

1212 1122 1212 112(22)

Friday, May 7, 2021

अपनी कोई भी पुरानी चीज़ उठाकर देखिये


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अपनी कोई भी पुरानी चीज़ उठाकर देखिये,

लुत्फ कितना आएगा बस आज़माकर देखिये ।


ज़िन्दगी में रंग कितने यूँ समझ में आएगा,

कोई भी नग्मा पुराना ख़ुद ही गाकर देखिये ।


मिल सकेगा तुमको भी लाखों दिलों का प्यार यूँ ,

बस किसी के जख्मों को मरहम लगाकर देखिये ।


कैसे अश्क़ों से भरा है आजकल हर आदमी,

हो सके काँधे पे उसका सर टिकाकर देखिये ।


हँसते हैं जो लोग किसी की मौत पर यूँ ही अबस,

कह दो कोई सपनों में अपना गँवाकर देखिये ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'

2122 2122 2122 212


★★आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे★★