Tuesday, October 26, 2021

मेरे हर सफ़ऱ में अगर तुम न होते

 

मेरे हर सफ़ऱ में अगर तुम न होते,
ग़मों में गुजरती खिजां रोते-रोते |

हैं दुश्मन मिरे इस जहां में बहुत अब,
समंदर-ए-वफ़ा में लगे थे जो गोते ।

यूँ लिखते हुए 'गम' कलम डगमगाए
थका हूँ मैं साहिल ये हुनर ढोते-ढोते |

पहर आखिरी जब शब्-ए-हिज्राँ बीती,
लुटे हम ख़ुदी में फ़लक होते-होते |

सितम ज़िन्दगी ने किये हैं मुसलसल,
मगर कर्मों को मैं थका धोते-धोते ।

.हर्ष महाजन 'हर्ष'

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ख़ुदी=अहँकार


Sunday, October 17, 2021

बड़ी चोट खाई जवां होते-होते

 

बड़ी चोट खाई जवां होते-होते,
यूँ गुजरे थे हम इश्क़ में रोते-रोते ।

ज़माने ने लिख दी अजब बेवफाई,
ये इल्जाम ले हम थके ढोते-ढोते  ।

यूँ किसके लिए हम बता अब तू साहिल,
कभी तो तू ख्वाबों में मिल सोते-सोते ।

तमन्ना है फुरसत से जुल्फों को तेरी,
संवारेंगे हाथों सहम खोते-खोते ।

बसर हो न अब ज़िंदगानी ये तेरी,
ये रिसते हुए ज़ख़्म अब धोते-धोते ।

--हर्ष महाजन 'हर्ष' ©
"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ'


Friday, October 8, 2021

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं

 

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं, 
ज़ह्र देते है वो फिर खुद ही दवा देते है ।

खौफ़ दुनिया का है जो इश्क खता कहते हैं, 
करके शोला ये बदन फिर क्यूँ हवा देते हैं |

इश्क भी करते हैं वो ज़ह्र असर होने तक, 
ज़ख़्म भी देते हैं वो फिर क्यूँ दुआ देते हैं |

बे-वफ़ा है वो मगर दिल है कि मानेगा नहीं,
दर्द शेरों से मेरे दिल के हरा देते हैं |

'हर्ष" जब कहता है खुद को ही बगावत कर ले,
खुद यूँ हाथों की लकीरों को मिटा देते है ।

___हर्ष महाजन 'हर्ष'©
9 अक्टूबर 2012
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