Monday, January 31, 2022

अगर शोहरत यहाँ इंसान की बदनाम हो जाए

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अगर शोहरत यहाँ इंसान की बदनाम हो जाए,
तो हक में जो करोगे बात वो इल्जाम हो जाए  ।

मुझे ग़म ये नहीं मुझको यहाँ पढता नहीं कोई,
मेरी चाहत मेरा ये ग़म कोई सर-ए-आम हो जाए।

ये उसकी जुल्फों के सदके लिखें मैंने बहुत नग्में,
मगर हर बार देखो ये कलम नीलाम हो जाये ।

कभी तो चूम ले मुझको मेरे जज़्बात की खातिर,
न जाने किस घडी इस ज़िन्दगी की शाम हो जाए ।

मेरी चाहत के मैं दीया बनूँ और वो बने बाती ,
मगर डर है जमाने का न ये नाकाम हो जाए ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222


Friday, January 28, 2022

इतनी करो भी हमसे शरारत न यूँ कभी

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इतनी करो भी हमसे शरारत न यूँ कभी,
आँखों से उठ ही जाए शराफत न यूं कभी |

देखे, जो चांदनी में, नहाया तेरा बदन,
हो जाए शह्र में ये बगावत न यूँ कभी |

वो चाँद जब फलक से कभी इस तरह झुके,
देखी है इस तरह की, इबादत न यूँ कभी |

आओ, चलें चमन से, कहीं दूर, गुलबदन,
ये चाँदनी, करे वो, ख़िलाफ़त न यूँ कभी |

चर्चा तेरी जफ़ाओं, का ये शह्र ढो रहा,
लगने लगे ये दिल में अदालत न यूँ कभी |

हर्ष महाजन 'हर्ष'
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6th Oct 2015 edited

Tuesday, January 25, 2022

छलक कर आंखों से अपनी कहीं सागर न बन जाऊँ



छलक कर आंखों से अपनी कहीं सागर न बन जाऊँ,
न दिल को चोट दो इतनी कहीं पत्थर न बन जाऊँ।

यूँ जुल्फों को गिरा कर तुम मुझे बेहोश न कर दो,
तो फिर गुज़रे पलों का ख़ुद मैं इक मंज़र न बन जाऊँ ।

ज़माने की हदों को तोड़ निगाह-ए-नाज़ से देखो,
मगर डर है मुहब्बत का कहीं रहबर न बन जाऊँ।

कशिश रुखसार पे इतनी कि देखें तो हुए घायल,
कहीं मैं वक़्त से पहले तेरा दिलबर न बन जाऊँ ।

मैं ज़िंदा हूँ कि शायद तुम कभी मिल जाओगे मुझको,
फनां होंगी उमीदें तो दिल-ए-मुज़्तर न बन जाऊँ ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222
25 जनवरी 22


निगाह-ए-नाज़=प्यार भरी नज़र
दिल-ए-मुज़्तर=व्याकुल, बैचेन

Sunday, January 23, 2022

आँगन में मेरे है जो शज़र तुमको इससे क्या

आँगन में मेरे है जो शज़र तुमको इससे क्या,
उजड़ेगा इससे मेरा ही घर तुमको इससे क्या ।

रहबर भी मिल सका न कोई इतनी भीड़ में, 
मुश्किल से कट रहा है सफ़र तुमको इससे क्या ।

माँ-बाप बेच कर थे मकाँ तुमको दे गए,
दर दर भटक रहे वो इधर तुमको इससे क्या ।

किस दर्द से गुजरता है शब्दों से खेलकर,
शायर करे कमाल मगर तुमको इससे क्या ।

दीवार ग़ल्त-फहमी की तुमने जो की खड़ी,
बिछुड़ा था मेरा लखत-ए-जिगर तुमको इससे क्या ।

टुकड़ों में बँट गया था जिगर माँ का पल में यूँ,
बेटी चली जो छोड़ पिहर तुमको इससे क्या ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
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ठंडी हवा का झोंका था आकर चला गया,

ठंडी हवा का झोंका था आकर चला गया,
इक मौसमी बहार लुभाकर चला गया ।

तूफाँ में फँस गया था समंदर के बीच में,
हो जाऊँगा फ़ना यूँ रुलाकर चला गया ।

रोया था कितनी बार भँवर के मैं जाल में,
लेकिन ख़ुदा किनारा दिखाकर चला गया ।

मुझको पता तूफाँ की हक़ीक़त का चल गया,
कीमत यूँ ज़िन्दगी की बताकर चला गया ।

फितरत वो ज़लज़ले की यहाँ थी भी इस तरह,
मकसद वो ज़िन्दगी के जलाकर चला गया ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2121 1221 212

Thursday, January 20, 2022

जब भी चाहो ये मुहब्बत को निभाना लेकिन


जब भी चाहो ये मुहब्बत को निभाना लेकिन,
पर तू मंदिर न वो मस्ज़िद को भुलाना लेकिन ।

बीच मझधार भँवर में भी फँसी कश्ती अगर,
गर खुदा सच में है देखेगा बचाना लेकिन ।

बे-वफाओं से तू जितनी भी मुहब्बत कर ले,
वो न भूलेंगे कभी दिल को दुखाना लेकिन ।

जिसके जज़्बात-ओ-खयालात में नफ़रत शामिल,
ज़ख़्म अपने न कभी उसको दिखाना लेकिन ।

लज़्ज़त-ए-इश्क़ से सरशार अगर हो तुम भी,
अपने अश्क़ों को न रुकने को मनाना लेकिन ।

हुस्न की ताब कोई दिल को लुभाए तेरे,
अपनी धड़कन न धड़कने से छुपाना लेकिन ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1122 1122 22(112)
21 जनवरी 22
जज़्बात-ओ-ख्यालात= भावनाएं और विचार
ताब=ताप, गर्मी
लज़्ज़त-ए-इश्क़=प्रेम और आनंद
सरशार=लबरेज़

Wednesday, January 19, 2022

आसमाँ बादल बिना नाशाद है


आसमाँ बादल बिना नाशाद है,
चाँदनी फिर चाँद की आज़ाद है । 

जब भी मौसम से ख़िज़ाँ जाने लगे,
तब समझना अब फ़िज़ा आबाद है ।

गर इबादत में बहाए अश्क़ जो,
वो ख़ुदा को इंसाँ की फरियाद है ।

जो मुहब्बत तोड़ धागा खो गई,
ज़िंदगी उसकी फ़क़त नाशाद है ।

खुदकशी को हो गया मजबूर वो,
शख्स वो जो प्यार में बर्बाद है ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 2122 212
20 जनवरी 22
नाशाद"=दुःखी, नाखुश।

Tuesday, January 18, 2022

सभी ने देखा है अब ख़ौफ़ इक उसकी निगाहों में

सभी ने देखा है अब ख़ौफ़ इक उसकी निगाहों में,
यकीनन राज़ है इसका उसी के ही गुनाहों में ।

कभी वो दिन थे फिक्र-ए-रंज था उसको नहीं कोई,
न जाने क्या हुआ रहता है अब ग़म की पनाहों में ।

वो टूटा अपनों के ज़ख़्मों से लगता नीम पागल अब,
नहीं दिखता बचा अब कोई उसके खैर-ख़्वाहों में ।

ये नफ़रत बढ़ गयी शायद दयार-ए-इश्क़ में इतनी,
उड़ीं हैं रातों की नींदे जो उसकी ख़्वाब-गाहों में ।

तसव्वुर में भी उसके तिलमिलाहट हो रही इतनी,
असर देखा है उठता दर्द हमने उसकी आहों में ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222

दयार-ए- इश्क़= प्यार की दुनियाँ
ख़्वाब-गाह=शयन-कक्ष

Monday, January 17, 2022

जो तू उठा दे मुझे रंजो ग़म से पार यहाँ



जो तू उठा दे मुझे रंजो ग़म से पार यहाँ,
मिले सकून तुझी से मुझे करार यहॉं।

कभी निगाह ने तेरी था मार डाला मुझे,
तुझी से दर्द मिला अर मिला ख़ुमार यहाँ ।

मिटा दे ज़ुल्म तू उस दिल की है तलाश मुझे,
महक उठे ये फ़िजां अर चले बहार यहाँ ।

तू कौन शख्स सर-ए-अंजुमन कहा था मुझे,
पुकारता जो मुझे हँस के बार बार यहाँ।

असीम दर्द लिए घूमता हूँ सीने में अब,
दिए हैं ग़म भी तो तूने मुझे हज़ार यहाँ ।

किसी को भी न मिला वो फलक जो मुझको मिला,
शब-ए-विसाल की बातें करे था यार यहाँ ।

यकीं मैं कैसे करूँ 'हर्ष' इन लकीरों पर,
मुहब्बतों में मिला मुझको अश्क़बार यहाँ ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1212 1122 1212 22(112)
18 जनवरी 22
शब-ए-विसाल=मिलन की रात
अश्क़बार=रोने वाला
सर-ए-अंजुमन=भरी सभा में

Sunday, January 16, 2022

जब से हुई है तुमसे मुलाकात शाम की



जब से हुई है तुमसे मुलाकात शाम की,
पढ़ता हूँ अब मैं गज़लें फ़क़त तेरे नाम की ।

शोहरत को दी न मैनें तवज़्ज़ो भी आज तक ,
चाही फ़क़त ज़रा सी मुहब्बत कलाम की ।

नफ़रत से हो रहे हैं ज़रर रिश्तों में भी अब,
उल्फ़त की रह गयी है ये तस्वीर नाम की ।

पलकों में कैसे जज़्ब करूँ अश्क़ ऐ खुदा,
यादें रहीं न काबू फ़क़त इक वो शाम की ।

रिश्तों में आ चुकी थीं दरारें भी इस तरह
होती नहीं है शाम बिना कोई जाम की ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2121 1221 212
17 जनवरी 22

ज़रर=नुकसान
जज़्ब= सोख

Saturday, January 15, 2022

दर्द-ए-दिल पर किसकी हैं परछाइयाँ


दर्द-ए-दिल पर किसकी हैं परछाइयाँ,
साथ जिनके इतनी हैं गहराइयाँ ।

ज़िन्दगी का यूँ सफ़ऱ मुश्किल हुआ,
इतनी रंजिश, इतनी हैं रुसवाईयाँ।

हो रही खामोश अब ये ज़िन्दगी,
ख़्वाब बन रह जायेंगी शहनाइयाँ।

ज़ख़्म हर पल कर रहे छलनी जिगर,
जिस सफ़र पर इतनी थीं रानाइयाँ ।

दर्द-ए-ग़म का है ठिकाना 'हर्ष' जब,
हमसफर जब से हुईं रुसवाईयाँ ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
"तुम न जाने किस जहाँ में खो गए"
2122 2122 212
15 जनवरी 22

रानाइयाँ=सुंदरता
रुसवाईयाँ=बेइजती ,बदनामी, अपमान और दुर्गति , निंदा, जिल्लत 

Friday, January 14, 2022

हुस्न होगा शबाब भी होगा


हुस्न होगा शबाब भी होगा,
सुर्ख चेहरे पे ताब भी होगा ।

ज़ुल्म रुख पे सितम जो ढाते हैं,
सोचता माहताब भी होगा ।

इश्क़ हो तल्ख़ तो समझ लेना,
प्यार गर है इताब भी होगा ।

प्यार इज़हार जब करे कोई,
हाथों में इक गुलाब भी होगा ।

हमसफ़र बेवफ़ा जो दिखने लगे,
आंखों में इज़्तिराब भी होगा ।

इश्क़ में है अगन तो उट्ठेगी,
आग गर उसमें आब भी होगा ।

मुफ़लिसों पर न ज़ुल्म ढा ऐसे, 
गर ख़ुदा है हिसाब भी होगा ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1212 22 (112)
15 जनवरी 22
★★★
इज़्तिराब=बैचेन, व्याकुल
इताब=गुस्सा,रोष
ताब= ताप, गर्मी
आब=पानी
अगन=तपिश

जो भी मिला गुलाब किताबों में रख लिया

 

जो भी मिला गुलाब किताबों में रख लिया,
है फर्क बस कि तुमने हिसाबों में रख लिया ।

हमको तो दर्द-ए-शौक-ओ-तमन्ना भी खूब थी,
तुमसे मिला था जो भी हिज़ाबों में रख लिया ।

अम्न-ओ-सकून चैन यहाँ तब से खो गया,
चेहरा उन्होंने जब से नकाबों में रख लिया ।

ये डर है तुमको खो न दें इस ख्याल से,
लम्हात था जो कीमती ख्वाबों में रख लिया ।

मीठी ज़ुबाँ का हमपे हुआ इस कदर असर,
लहज़ा मिज़ाज़ तुमसा जवाबों में रख लिया ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2121 1221 212
14 जनवरी 22

Tuesday, January 11, 2022

हो रही रुख़्सती अब मेरी धाम को

 

हो रही रुख़्सती अब मेरी धाम को,
फिर चढ़ा फूल जितने चढ़ें शाम को ।

चल दिया पाँव उल्टे मैं हो बेवफा,
जी रहा अब तलक जो तेरे नाम को ।

रो रहे चाँद तारे फलक पर सभी,
दे रहा हूँ परख ले तू इस दाम को ।

लाश पर जो भी करना ये मातम मेरा,
पर्दा कर लेना पीना हो जब जाम को ।

कैसा किरदार मुझको ये तूने दिया,
ऐ ख़ुदा कैसे निपटाऊँ इस काम को ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212 
12 जनवरी 22

तेरी सोहबत में दिल ये संभल जाएगा

तेरी सोहबत में दिल ये संभल जाएगा,
कर यकीं अब नहीं तो ये जल जाएगा ।

देख लेना कभी इश्क़ इन आँखोँ में,
थोड़ी चाहत दिखाना मचल जाएगा ।

तू ख़फ़ा है मुझे ये पता था मगर,
पर यकीं ये नहीं था बदल जायेगा ।

दिल में खामोशियाँ अब हैं पलने लगीं, 
थोड़ा बहला देगा ये उछल जाएगा ।

हमसफ़र छोड़ मेहमान बन तू मुझे,
कैसे कर लूँ यकीं मुझको छल जाएगा ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

Friday, January 7, 2022

जब कभी दिल किसी का दुखाया करो




जब कभी दिल किसी का दुखाया करो,
दो कदम ग़म के भी तो बढ़ाया करो ।

सिरफिरा भी कहे गर वो पागल भी फिर,
ऐसे नख़रे भी फिर तुम उठाया करो ।

जो कहा ही नहीं, उसने वो भी सुना,
फिर तो किस्मत पे आँसू बहाया करो ।

उम्र भर तुम ख़ताओं में मशगूल थे,
अपने दिल को भी ये तुम बताया करो ।

बेवफा निकली वो फिर कहा उसने ये,
धीरे-धीरे उसे तुम भुलाया करो ।

ग़म का है या खुशी का मगर कुछ तो है,
ये सफ़ऱ ज़िन्दगी का निभाया करो ।

जब चले जिक्र तेरा किसी बज़्म में,
दिल धड़कता तेरा भी सुनाया करो ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

बुझ गए जब दिए तो अँधेरा हुआ

बुझ गए जब दिए तो अँधेरा हुआ, 
चाँद निकला तो समझा सवेरा हुआ ।

ख़्वाब मेरे लिए उसकी आँखों में था,
टूटा, उसका हुआ अर न मेरा हुआ ।

इक चराग-ए-मुहब्बत जले दिल में फिर,
इसलिए नाम उसका उकेरा हुआ ।

फिर मुहब्बत में ऐसी चली आँधियाँ,
ज्यूँ समंदर में तूफाँ तरेरा हुआ ।

कल्पनाओं में इतनी उड़ाने भरीं,
हुस्न ऐसा था उसने बिखेरा हुआ ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

Thursday, January 6, 2022

कहीं चाहत न उसकी रूठ कर सर-ए-आम हो जाये

कहीं चाहत न उसकी रूठ कर सर-ए-आम हो जाये,
खुला दिल है खुला जज़्बात न इल्ज़ाम हो जाये ।

ग़ज़ल लिखता है वो या ख़्वाब लिखता महज़बीनों के,
मुझे डर है हसीनों में न वो बदनाम हो जाए  ।

बिलख़ते उसके अरमाँ मिल रही है ये सज़ा कैसी,
मिले गर आंखों से पीने को फिर आराम हो जाये ।

मरीज-ए-इश्क़ का दुनियाँ में लगता है नहीं कोई,
कहीं ये इश्क़ दुनियाँ से न अब नीलाम हो जाये ।

मेरे नग्मों की कीमत घट रही लिख-लिख सफीनों पर,
ज़ुबाँ दे दे कोई हर नग्में को वो जाम हो जाये ।

किसे होगा न अपने हुस्न पर क्यूँ नाज़ इतना जब,
किसी के वास्ते ये ज़िन्दगी पैगाम हो जाये ।

तसव्वुर में अगर न दिल लगे तो फिर चले आना,
कहा उसने मुहब्बत अबकि न नाकाम हो जाये ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222

Wednesday, January 5, 2022

खूबसूरत ग़ल्त-फहमी हो गयी

खूबसूरत ग़ल्त-फहमी  हो गयी,
बीज दिल में इक हसीना बो गयी  ।

क्यूँ उसे अब ढूँढता हूँ दर-बदर,
क्या मुक़द्दर में मुहब्बत हो गयी ।

ग़म खुशी के रंगों को बस देखकर,
मेरे हाथों की वो रेखा खो गयी ।

कर दिया इज़हार उसने प्यार का,
फिर अचानक मेरी धड़कन सो गयीं ।

रोशनी बुझने लगी दिए कि अब,
मेरे दिल से जो निकल के वो गयी ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 2122 212

चाँद जब तक फलक पर नुमाया नहीं

चाँद जब तक फलक पर नुमाया नहीं,
रुख से जुल्फों को उसने हटाया नहीं ।

उसको अहसास था मेरे ज़ख़्मों का पर,
अश्क़ पत्थर ने इक भी बहाया नहीं ।

मुफ़लिसी रिश्तों में बढ़ गयी इस कदर,
दिल धड़कता रहा पर बताया नहीं ।

मेरी नज़्मों ने उसको पुकारा बहुत,
थी कसक उसको भी पर रुलाया नहीं ।

सर झुका के मिला था मैं उसको मगर,
क्यूँ उठा के वो खंजर चलाया नहीं ।

अर्थी मेरी चली अर्थी उसकी चली,
पर्दा फिर भी किसी ने उठाया नहीं ।

दर्द सह कर भी इतना रहम दिल था 'हर्ष'
दिल दिया भी मगर दिल लगाया नहीं।

हर्ष कुमार 'हर्ष'
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घाटियों के बीच इक वो शह्र है

घाटियों के बीच इक वो शह्र है,
आदमी रहते जहाँ अब कहर है ।

ज़िन्दगी कब तक उन्हें रौंदेगी अब,
कब तलक ये जंग उनकी सहर है ।

सरहदों पर जंग जारी है अभी,
जानें घाटी में ये कैसी लहर है ।

लोग जो बे-घर कभी थे हो गए,
दिल में उनके जाने कितना ज़हर है ।

जाने क्यूँ छेड़ी है मैनें ये ग़ज़ल,
कैसा मंज़र जाने कैसी बह्र है ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 2122 212

Tuesday, January 4, 2022

यूँ ही ज़िंदगी पर असर देख लेना

यूँ ही ज़िंदगी पर असर देख लेना,
कॅरोना का अब तुम गदर देख लेना ।

तबाही का आलम चलाया है जिसने,
नए साल उसका हुनर देख लेना ।

न अपनी खबर है न दुनियाँ की चिंता,
सियासत के वादे इधर देख लेना ।

यही सिलसिला अब यूँ  चलता रहेगा,
गदर करने वालों का सफ़ऱ देख लेना ।

है इतनी शिकायत मुझे अब खुदा से,
अँधेरों में जाएँ किधर देख लेना ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
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