Friday, January 28, 2022

इतनी करो भी हमसे शरारत न यूँ कभी

...

इतनी करो भी हमसे शरारत न यूँ कभी,
आँखों से उठ ही जाए शराफत न यूं कभी |

देखे, जो चांदनी में, नहाया तेरा बदन,
हो जाए शह्र में ये बगावत न यूँ कभी |

वो चाँद जब फलक से कभी इस तरह झुके,
देखी है इस तरह की, इबादत न यूँ कभी |

आओ, चलें चमन से, कहीं दूर, गुलबदन,
ये चाँदनी, करे वो, ख़िलाफ़त न यूँ कभी |

चर्चा तेरी जफ़ाओं, का ये शह्र ढो रहा,
लगने लगे ये दिल में अदालत न यूँ कभी |

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2121 1221 212

https://www.facebook.com/167070936684712/posts/989831204408677/

6th Oct 2015 edited

2 comments:

  1. वाह ... लाजवाब शेरोन से सजी एक और लाजवाब गज़ल ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरनीय दिगम्बर जी ।

      Delete