Tuesday, January 18, 2022

सभी ने देखा है अब ख़ौफ़ इक उसकी निगाहों में

सभी ने देखा है अब ख़ौफ़ इक उसकी निगाहों में,
यकीनन राज़ है इसका उसी के ही गुनाहों में ।

कभी वो दिन थे फिक्र-ए-रंज था उसको नहीं कोई,
न जाने क्या हुआ रहता है अब ग़म की पनाहों में ।

वो टूटा अपनों के ज़ख़्मों से लगता नीम पागल अब,
नहीं दिखता बचा अब कोई उसके खैर-ख़्वाहों में ।

ये नफ़रत बढ़ गयी शायद दयार-ए-इश्क़ में इतनी,
उड़ीं हैं रातों की नींदे जो उसकी ख़्वाब-गाहों में ।

तसव्वुर में भी उसके तिलमिलाहट हो रही इतनी,
असर देखा है उठता दर्द हमने उसकी आहों में ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222

दयार-ए- इश्क़= प्यार की दुनियाँ
ख़्वाब-गाह=शयन-कक्ष

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