Thursday, January 6, 2022

कहीं चाहत न उसकी रूठ कर सर-ए-आम हो जाये

कहीं चाहत न उसकी रूठ कर सर-ए-आम हो जाये,
खुला दिल है खुला जज़्बात न इल्ज़ाम हो जाये ।

ग़ज़ल लिखता है वो या ख़्वाब लिखता महज़बीनों के,
मुझे डर है हसीनों में न वो बदनाम हो जाए  ।

बिलख़ते उसके अरमाँ मिल रही है ये सज़ा कैसी,
मिले गर आंखों से पीने को फिर आराम हो जाये ।

मरीज-ए-इश्क़ का दुनियाँ में लगता है नहीं कोई,
कहीं ये इश्क़ दुनियाँ से न अब नीलाम हो जाये ।

मेरे नग्मों की कीमत घट रही लिख-लिख सफीनों पर,
ज़ुबाँ दे दे कोई हर नग्में को वो जाम हो जाये ।

किसे होगा न अपने हुस्न पर क्यूँ नाज़ इतना जब,
किसी के वास्ते ये ज़िन्दगी पैगाम हो जाये ।

तसव्वुर में अगर न दिल लगे तो फिर चले आना,
कहा उसने मुहब्बत अबकि न नाकाम हो जाये ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222

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