Tuesday, January 25, 2022

छलक कर आंखों से अपनी कहीं सागर न बन जाऊँ



छलक कर आंखों से अपनी कहीं सागर न बन जाऊँ,
न दिल को चोट दो इतनी कहीं पत्थर न बन जाऊँ।

यूँ जुल्फों को गिरा कर तुम मुझे बेहोश न कर दो,
तो फिर गुज़रे पलों का ख़ुद मैं इक मंज़र न बन जाऊँ ।

ज़माने की हदों को तोड़ निगाह-ए-नाज़ से देखो,
मगर डर है मुहब्बत का कहीं रहबर न बन जाऊँ।

कशिश रुखसार पे इतनी कि देखें तो हुए घायल,
कहीं मैं वक़्त से पहले तेरा दिलबर न बन जाऊँ ।

मैं ज़िंदा हूँ कि शायद तुम कभी मिल जाओगे मुझको,
फनां होंगी उमीदें तो दिल-ए-मुज़्तर न बन जाऊँ ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222
25 जनवरी 22


निगाह-ए-नाज़=प्यार भरी नज़र
दिल-ए-मुज़्तर=व्याकुल, बैचेन

8 comments:

  1. एक शानदार गजल, हर शेर लाजवाब, शब्दों का चयन बहुत बढ़िया👌👏

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    1. आपकी आमद औऱ उस पर आपकी होंसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया । इस बज़्म को यूँ ही रौशन करते रहिए आदरणीय।💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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  2. छलक कर आंखों से अपनी कहीं सागर न बन जाऊँ,
    न दिल को चोट दो इतनी कहीं पत्थर न बन जाऊँ।
    यूँ जुल्फों को गिरा कर तुम मुझे बेहोश न कर दो,
    तो फिर गुज़रे पलों का ख़ुद मैं इक मंज़र न बन जाऊँ ।////
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति हर्ष जी। बहुत प्यारी ग़ज़ल है! अपना तो इस विधा में हाथ तंग है 🙏🙏

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  3. रेणु जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका आपको ये पेशकश पसंद आई । सच कहूं तो ये आपकी दरियादिली औऱ ऊपर वाले का कर्म है आदरनीय । यूँ ही आते रहियेगा ।💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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  4. प्रतिलिपी पर भी मुझे फॉलो कर सकते हैं ।

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    1. जरूर हर्ष जी, मैं भी वहां अर्से से हुं, ये अलग बात है वहां मेरे पाठक कम है। अत्यंत आभार आपका 🙏🙏

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  5. वक़्त से पहले तेरा दिलबर ...
    यूँ तो हर शेर कमाल है और ये ख़ास है ... प्रेम रैंक के कुछ शेर तो सच में लाजवाब कर रहे हैं ...

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    1. आपकी पसंदंगी के लिए दिली धन्यवाद आपका । ये आपका नज़रिया है जो मेरे लफ़्ज़ों में उतार आता है आदरनीय । उम्मीद करता हूँ आप आइंदा भी होंसिला अफजाई के लिए आते रहेंगे ।

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