Thursday, December 30, 2021

ज़िन्दगी से मुझे कुछ गिला ही नहीं

ज़िन्दगी से मुझे कुछ गिला ही नहीं ,
जब सिवा रंजिशों के मिला ही नहीं ।

दर्द हो कर जुदा उसने ऐसा दिया,
अर कहा इससे बढ़ कर सज़ा ही नहीं ।

चाह थी इश्क कर मैं फलक पे उडूँ,
इश्क़ पर मुझसे अब तक हुआ ही नहीं ।

मैं तड़प कर गिरा, वो नज़र से गिरा,
मैं तो उठ न सका, वो उठा ही नहीं ।

उसको बर्बाद कर दूँ थे मौके मगर,
पीठ पर  मुझसे खंजर चला ही नहीं ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

Saturday, December 25, 2021

ऐसे नसीब का तू बता खुद भी क्या करूँ

 बीती है किस तरह से कहूँ अजनबी के साथ,
खेला हो खेल जैसे मेरी ज़िंदगी के साथ ।

ऐसे नसीब का तू बता खुद भी क्या करूँ,
जो दे रहा सलाम मुझे बेरूखी के साथ ।

वो शख्स चल दिया है मेरा बन के हमसफर,
होते रहे थे हादसे जिस आदमी के साथ । 

शिकवे गिले भी खूब रहे मुझको नसीब से,
है इल्तिज़ा ख़ुदाया न हो ये किसी के साथ ।

आया नहीं था मुझको कभी  इतना सा हुनर,
रोता फिरूँ मैं खुशियों में भी बेबसी के साथ ।

किस-किस तरह से आ गिरी रिश्तों पे बिजलियाँ,
टूटा था रिश्ता मेरा मगर सादगी के साथ ।

रिश्ता यूँ रक्खा ताक पे उसने भी इस तरह,
गुजरी हो अजनबी की जैसे अजनबी के साथ ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
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"मिलती है ज़िन्दगी में मुहब्बत कभी-कभी"

Monday, December 20, 2021

वो जोर से हँसने लगी अब देखकर चहरा मेरा

 

वो जोर से हँसने लगी अब देखकर चहरा मेरा,
हैरान था मैं सोचकर कि क्या यही रुतबा मेरा ।

तोड़ा है उसने इस तरह लिख कर मुझे इक बेवफा,
क्या दिल में लेके आया था अब अक्स क्या उभरा मेरा ।

बैचैन हूँ उलझा भी हूँ दस्तक जो दिल पे थी तेरी,
पर क्या करूँ ये दिल नहीं है अब तलक पिघला मेरा ।

सहता रहा नफरत यहाँ हँसती रही खामोशियाँ,
मायूस सा तकता रहा उठता रहा परदा मेरा ।

ये ज़लज़ला था कैसा जो इज़्ज़त बहा के ले गया,
मैं देखता ही रह गया बिकता रहा जलवा मेरा ।

क्या मुफलिसी बन कर मिली इंसान के अब भेष में,
क्या गिर गया हूँ इतना मैं क्या गिर गया लहजा मेरा ।

जिन महफिलों में गा रहा था ग़ज़लें उनके नाम की,
उन महफिलों में हर जगह था चल रहा फ़तवा मेरा ।

हर्ष महाजन 'हर्ष' ©
2212 2212 2212 2212
"इक रास्ता है ज़िंदगी जो थम गये तो कुछ नहीं"
"जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ"


Friday, December 17, 2021

मिट्टी की सोंधी खुशबू मिलेगी जिधर

मिट्टी की सोंधी खुशबू मिलेगी जिधर,
गीत हम धड़कनों पे सुना दें उधर ।

तुम चले आना दिल जब भी मचले तेरा,
खोल देंगे मुहब्बत से अपना जिगर ।

हक मुहब्बत का हमने अदा कर दिया,
तुम दिखा दो हमें अब तो अपना हुनर ।

नेक राहों पे चल के है खोया बहुत,
अब बता दो हमें अब कि जाएं किधर ।

जब भी आओगे तुम देना दस्तक  हमें,
प्यार से इक ग़ज़ल गा देंगे हम इधर ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'©
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Wednesday, December 8, 2021

था तो वो अजनबी फिर भी जालिम नहीं

अश्क़ पीता रहा अर पिलाता रहा,
बेबसी में मुहब्बत निभाता रहा ।

वो न मेरा हुआ अर न अपना मगर,
वो रकीबों में महफ़िल सजाता रहा ।

था तो वो अजनबी फिर भी जालिम नहीं,
मेरे ज़ख़्मों पे मरहम लगाता रहा ।

जब अना भी मेरी आसमाँ छू रही,
तब भी कदमों में ख़ुद को झुकाता रहा ।

उसकी राहों से जब भी गुजरता कभी,
अलविदा पे वो आँसू गिराता रहा ।  

दिल है वीराँ कहे जब मिले राहों में ,
खुद भी जलता मुझे भी जलाता रहा ।

मैनें नफरत भी उससे बहुत की मगर,
उसका हूँ मैं नसीबा बताता रहा ।

आके ख्वाबों में रातों को इक उम्र से,
खुद भी रोता, मुझे भी रुलाता रहा ।

आस में वो भटकता कई जन्मों से,
कब्र पर मेरी दीपक जलाता रहा ।

हर्ष महाजन 'हर्ष' ©
2 12 212 212 212

Monday, November 29, 2021

ओस की बूंदें जब हमको मोती लगें,

ओस की बूंदें जब हमको मोती लगें,

दूबों पर टिकती हमको वो सोती लगें ।


उँगलियों से उन्हें छू के देखूँ मैं जब,

वो सितारों को खुद में ही खोती लगें ।


मुट्ठियों में कभी बन्द कर लूँ भी गर,

जो लकीरें है हाथों में धोती लगें ।


जब वो पत्तों से छल-छल सी धुन वो करें,

गिर के टप-टप वो सुंदर सी मोती लगें ।


उँगली के पोरों पे कैद जब भी करूँ,

दिल में उठती उमंगों को ढोती लगें ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

212 212 212 212

Tuesday, October 26, 2021

मेरे हर सफ़ऱ में अगर तुम न होते

 

मेरे हर सफ़ऱ में अगर तुम न होते,
ग़मों में गुजरती खिजां रोते-रोते |

हैं दुश्मन मिरे इस जहां में बहुत अब,
समंदर-ए-वफ़ा में लगे थे जो गोते ।

यूँ लिखते हुए 'गम' कलम डगमगाए
थका हूँ मैं साहिल ये हुनर ढोते-ढोते |

पहर आखिरी जब शब्-ए-हिज्राँ बीती,
लुटे हम ख़ुदी में फ़लक होते-होते |

सितम ज़िन्दगी ने किये हैं मुसलसल,
मगर कर्मों को मैं थका धोते-धोते ।

.हर्ष महाजन 'हर्ष'

122 122 122 122

ख़ुदी=अहँकार


Sunday, October 17, 2021

बड़ी चोट खाई जवां होते-होते

 

बड़ी चोट खाई जवां होते-होते,
यूँ गुजरे थे हम इश्क़ में रोते-रोते ।

ज़माने ने लिख दी अजब बेवफाई,
ये इल्जाम ले हम थके ढोते-ढोते  ।

यूँ किसके लिए हम बता अब तू साहिल,
कभी तो तू ख्वाबों में मिल सोते-सोते ।

तमन्ना है फुरसत से जुल्फों को तेरी,
संवारेंगे हाथों सहम खोते-खोते ।

बसर हो न अब ज़िंदगानी ये तेरी,
ये रिसते हुए ज़ख़्म अब धोते-धोते ।

--हर्ष महाजन 'हर्ष' ©
"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ'


Friday, October 8, 2021

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं

 

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं, 
ज़ह्र देते है वो फिर खुद ही दवा देते है ।

खौफ़ दुनिया का है जो इश्क खता कहते हैं, 
करके शोला ये बदन फिर क्यूँ हवा देते हैं |

इश्क भी करते हैं वो ज़ह्र असर होने तक, 
ज़ख़्म भी देते हैं वो फिर क्यूँ दुआ देते हैं |

बे-वफ़ा है वो मगर दिल है कि मानेगा नहीं,
दर्द शेरों से मेरे दिल के हरा देते हैं |

'हर्ष" जब कहता है खुद को ही बगावत कर ले,
खुद यूँ हाथों की लकीरों को मिटा देते है ।

___हर्ष महाजन 'हर्ष'©
9 अक्टूबर 2012
2122 1122 1122 22

Sunday, August 29, 2021

अगर दिल पर मेरे उसका कभी इख्तियार हो जाता

 अगर दिल पर मेरे उसका कभी इख्तियार हो जाता,
ये हस्ती तक बिखर जाती मुझे इंतज़ार हो जाता |

मैं खुद अपनी निगाहों से गिरा और ये भी मुमकिन था,
कभी मैं खोल देता दिल, वो फिर राजदार हो जाता |

ये तो अच्छा हुआ वो रूठ कर यूँ ही चल दिए मुझसे,
अगर तीरे नज़र चलता तो दिल आर-पार हो जाता |

अमानत थी किसी की फिर भी इस दिल को रखना काबू में,
कशिश इतनी थी आँखों में ये दिल तार-तार हो जाता |

बिछुड़ के रो चुका हूँ बे-वजह वो तो दिल था बेगाना,
न पगलाता ये दिल मेरा तो मैं होशियार हो जाता |

_____हर्ष महाजन 'हर्ष'
09 मार्च 2016

Non standard Behr.
1222 1222 1221 2122 2

Thursday, August 26, 2021


अब तेरा मेरा जाने बसर है कि नहीं है,
जो घाव दिए तूने ख़बर है कि नहीं है ।

महफ़िल से अचानक ही अधर में चले जाना,
देखो तो ग़ज़ल में वो असर है कि नहीं है | 

छलनी जो किया तूने हुआ कैसे मैं जालिम, 
अब सोच कोई मुझमें कसर है कि नहीं है |

इतना था हुआ रंज मुझे खुदकशी चुनी, 
सोचा न समंदर में भँवर है कि नहीं है |  

मैं तुझसे परेशान हुआ अश्क़ों से ख़ारिज़,  
जानू न मुकद्दर में ठहर है कि नहीं है |

________हर्ष महाजन 'हर्ष' "©
©15 जून 2016 फेसबुक
बहरे हज़ज़ मुसम्मन अखरब महफूफ महजूफ 
221 - 1221 - 1221 - 122

Monday, August 16, 2021

आबरू वतन की आज यूँ बची कि क्या कहें

 

कारगिल युद्ध, जिसे ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है।


आबरू वतन की आज यूँ बची कि क्या कहें,
फौज़ अपनी कारगिल में यूँ लड़ी कि क्या कहें ।

दुश्मनों के काफिले जो हिन्द की ज़मीं पे थे,
फौज़ ए हिन्द बन के शोला यूँ लड़ी के क्या कहें ।

दहले थे वो लाडलों की माँओ के तो दिल ही थे,
देख कर तिरंगे में वो यूँ खड़ी कि क्या कहें ।

एक तरफ जंग कारगिल की दूजी थी सियासती,
जंग ये सियासतों ने यूँ लड़ी कि क्या कहें ।

दुश्मनों के संग दोस्ती निभा रहा था हिन्द,
दोस्ती ये छल के महँगी यूँ पड़ी कि क्या कहें ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 1212 1212 1212
"मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कसूर है"


आसतीं में सांप है अब जाने कितने

 

आसतीं में सांप है अब जाने कितने,
हम रहे बेख़ौफ़ यूँ बेगाने कितने ।

अपने ही हमराज अब समझाने निकले,
चोट खाके भी हैं हम अनजाने कितने ।

नफ़रतों के साये में हम तन्हा तन्हा,
रिश्ते लगते हो गए वीराने कितने ।

साजिशों को हादसा समझा किये हम,
बन गए अनजाने में अनजाने कितने ।

पर्दा सरका आँख से जब हरसु जानिब,
टूटे सब रिश्ते बने अफसाने कितने ।

रौशनी जब मांग ली जलते दियों से,
वो बहाने यूँ लगे बरसाने कितने ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 2122 2122
"छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा"


Saturday, August 7, 2021

गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,

गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,
हम मुहब्बत में हैं लेकिन दुश्मनी करते रहे |

दिल तो था मजबूर लेकिन आँखे आब-ए-चश्म थीं,
पर कदम बढ़ते रहे उनके सितम चलते रहे |

हर सितम आखों में उनकी आइने सा यूँ छला,
हम भी पहलू में दिया बन जलते अर बुझते रहे |

इश्क में खुद शूल बन वो सीने में चुभने लगे,
फिर वही ग़म ज़िंदगी में घुँघरू बन बजते रहे |

कैसे लिख दें दास्ताँ अपने ही लफ़्ज़ों में सनम,
ग़म समंदर हो चले अब दिल में जो पलते रहे |

_______हर्ष महाजन 'हर्ष'

आब-ए-चश्म = आंसू

बहरे रमल मुसम्मन महजूफ
2122-2122-2122-212



सर-ए-आम यूँ ही जुल्फ संवारा न कीजिये


सर-ए-आम यूँ ही जुल्फ संवारा न कीजिये
बे-मौत हमको हुस्न से मारा न कीजिये |

लहराते हैं यूँ गेसू कि दिल भी मचल उठे,
काँधे को यूँ अदा से उसारा न कीजिये |

रुखसार पर परीशां हो बरपा रहीं कहर,
ये नागिनों सी ज़ुल्फ़ अवारा न कीजिये |

कुंडल बनी है लट तिरी आँखें हैं छल रहीं,
आ आ के ख्वाब में यूँ इशारा न कीजिये |

जब झटकते हो ज़ुल्फ़ मेरी शायरी बने,
अब बाँध इनको जाम तो खारा न कीजिये |

ये ज़ुल्फ़ यूँ गिराईं कि दिल ही दहल उठा,
है इल्तिजा ये भूल दुबारा न कीजिये |

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2121 1221 212


©1988

मेरा दिल मुझसे बदगुमा लेकिन


मेरा दिल मुझसे बदगुमां लेकिन,
ये तो कातिल है रहनुमां लेकिन |

दिल है रंगीन महफ़िलों पे फ़िदा,
हरसूं ज़ख्मों के हैं निशां लेकिन |

कितने हैं दर्द अश्क कहते हैं ये,
दिल में रोशन है इक समां लेकिन |

मैं भी सदमें में संग रोया बहुत, 
मुझपे इतना था मेहरबां लेकिन |

कितने ही दर्द इश्क में था लिए,
बंद है दिल की अब जुबां लेकिन |

आज जाने की बात मत करना,
अश्क रुकते न दर्द भी लेकिन |

_______हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1212 22(112)
"ज़िक्र होता है जब कयामत का"

Thursday, July 22, 2021

वो टिम-टिम सितारों को छिपना ही होगा

 ये रुख अब हवा का बदलने लगा है,

यूँ मौसम ये शोला उगलने लगा है ।


पता जब चला साजिशों का था हमको,

तो दिल कातिलों का दहलने लगा है ।


भला कब तलक क़ैद साँसे रहेंगी,

कवच वादियों का पिघलने लगा है ।


क्यूँ गुमराह होंगी दिशाएँ ये कब तक,

ये तेवर फ़लक का बदलने लगा है ।


हवाओं में फौलाद जैसा है जादू,

घटाओं का आलम छिटकने लगा है।


वो टिम-टिम सितारों को छिपना ही होगा,

अँधेरे में सूरज निकलने लगा है ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

बह्र:

122 122 122 122

Saturday, July 17, 2021

इतना हुआ था बे-कदर ज़ख्मों को पी गया

 2212 2212 2212 12


इतना हुआ बे-कदर इन ज़ख्मों को पी गया,

इक बे-वफ़ा सी ज़िंदगी अश्कों मे जी गया |


कुछ इस तरह है अब मेरी यादोँ का ये सफ़र,

कुछ रिस रहें हैं ज़ख़्म अब कुछ मैं ही सी गया ।


यूँ इस तरह से गर्दिशों में छोड़कर मुझे,

नज़रों में था जो शख्स मेरे दिल से भी गया ।


दुनियाँ में जो मैं जी रहा इज़्ज़त ओ शान से,

क्या गर्दिश-ए-दौरा चला फिर नाम ही गया ।


वो बे-वफ़ा या बे-हया था यार वो मेरा,

शिकवे ज़ुबाँ पे रंज-ओ-ग़म ख़ुद मैं ही पी गया ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

Tuesday, June 29, 2021

बेवफ़ा को अश्क़ों की क्यूँ हो ख़बर

 ***


बेवफ़ा को अश्क़ों की क्यूँ हो ख़बर,

कर गया दिल को मेरे जो बे- ज़िगर ।


चाँद उतरा है ज़मी पर थी ख़बर,

अब नहीं होता कोई मुझको असर ।


इतना अर्सा था वो मेरा आशना,

पर अधूरा कर गया मेरा सफ़र ।


जिन लबों पर मुस्कराहट थी कभी,

अब नहीं करती ख़बर कोई असर ।


अश्क़ों से दामन है इतना भर गया,

अब नहीं चाहत कोई हो हमसफ़र ।


जिनको मुद्दत से कोई तरसा किये,

कह नहीं सकते हो कोई मोतबर ।


आशियाँ दिल में बनाने के लिए,

सह लिया मैं बेवफ़ाई का क़हर ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'

2122 2122 212

"तुम न जाने किस जहॉं में खो गए"


मोतबर = भरोसेमंद

Tuesday, June 22, 2021

घर किसी के दिया इक, जला कर के देख़

 ***


घर किसी के दिया इक, जला कर के देख़,

क्या मिलेगा सकूँ,     आज़मा कर के देख़ ।


सरहदों पर हैं बुझते,        चिरागों के घर,

जो हक़ीक़त है ख़ुद की बना कर के देख़ ।


देखनी है दिलों में,     ख़ुशी अपनों की,

मिट सकें रंजिशें तो, मिटा कर के देख़ ।


दुश्मनी भी है गर,   दिल धड़कते  मगर,

दिल मिले हों न हों, मुस्करा कर के देख़ ।


इक़ अना के लिए,      अजनबी हो गए,

पर ख़ुदा के लिए सर झुका कर के देख़,


कब ख़ुशी कब थे ग़म कब हुए चश्म नम,

यादें अपनी पुरानी,       उठा कर के देख़ ।


ज़िन्दगी के लिए,          वस्ल की चाह में 

अपने दिल में ख़ुदा को बिठा कर के देख़ ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'

212 212 212 212


Monday, June 21, 2021

डैडी (पार्ट 2)


****


जब से बिछुड़े हो, ठंडी हवा कौन दे,

 अब तो माँ भी नहीं है दवा कौन दे ।


ज़िन्दगी भर जो हमने खतायें हैं की,

अब तरसते हैं हमको सज़ा कौन दे ।


ज़ख़्म गहरे हैं राहत से अनजान हैं,

अब तुम्हारे सिवा ये भला कौन दे ।


शूल दिखते नहीं थे कभी तब हमें,

कुछ सुझाओ इन्हें अब हटा कौन दे ।


रोज़ ढूंढा किये हम सुनों कम से कम,

ये बता दो तुम्हारा पता कौन दे ।


जी रहे हैं तुम्हारे ही लफ़्ज़ों पे हम,

जीत पर अब हमारी दुआ कौन दे ।


कोई ऐसा मिले उनकी यादों में अब,

देखते हैं हमें, अब हरा कौन दे ।


------हर्ष महाजन 'हर्ष'

212 212 212 212

"तुम अगर साथ देने का वादा करो"

Sunday, June 20, 2021

हो मुहब्बत ख़फ़ा तो वफ़ा कौन दे

 ***

हो मुहब्बत ख़फ़ा तो वफ़ा कौन दे,

ज़ख़्म गहरा है पर अब दवा कौन दे ।


ख़्वाब तू था मेरा ज़िन्दगी भी मेरी,

इस हक़ीक़त का तूझको पता कौन दे ।


तेरी उल्फ़त को गर मैं निभा न सका,

मानता हूँ मैं पर अब सज़ा कौन दे ।


बेवफ़ा गर हूँ मैं तो सज़ा दे मुझे,

बद्दुआ देगा तू फिर दुआ कौन दे ।


दिल ये पत्थर नहीं बेवफ़ा भी नहीं,

पर ज़माने में इसको हवा कौन दे ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

212 212 212 212

"तुम अगर साथ देने का वादा करो"

Wednesday, June 16, 2021

आपसी रिश्तों में इतना जाने क्यूँ अब ज़ह्र है

 ***


आपसी रिश्तों में इतना जाने क्यूँ अब ज़ह्र है,

कुछ हुए क़ातिल ज़ुबाँ से कुछ में  थोड़ी खैर है ।


हमने डरते डरते कह दी इक ग़ज़ल अपनों में फिर,

देखते ही देखते हर शख़्स लगता  ग़ैर है ।


बड़ रही हर क़ौम में अब दुश्मनों की हलचलें,

कोई टूटे या न टूटे, टूटता ये शह्र है ।


कहता हूँ ग़ज़लों में अपनी रिश्तों की तासीर भी,

बोल जितने हैं ज़रूरी उतनी इसकी बह्र है ।


बिक़ता है इंसाफ अब तो हर जगह मक्कारी है,

अब सियासत भी फ़लक पे हर ज़ुबाँ पे ज़ह्र है ।


बे-वजह कुछ अपने छूटे मज़हबी इस दाव में,

ये हक़ीक़त जानकर भी ये सियासी बैर है ।


राज़-ए-उल्फ़त को बताना ये भी मेरा फ़र्ज़ था,

अपना तो अपना रहेगा ग़ैर फिर भी ग़ैर है ।


----हर्ष महाजन 'हर्ष'

2122 2122 2122 212

"दिल लगाकर हम ये समझे ज़िन्दगी क्या चीज़ है"

Tuesday, June 15, 2021

मैं उसका अश्क़ भी मैं ही दवा हूँ

 ***


जो घोला ज़ह्र उसका मैं पता हूँ ।

मैं उसका अश्क़ भी मैं ही दवा हूँ।


तेरे दिल में बता शिकवा है कोई,

तो दे देता मैं ख़ुद को ही सज़ा हूँ ।


तुझे मेरी जो आदत हो चुकी है,

फ़िज़ाओं की मैं सच ठण्डी हवा हूँ।


सुना है मर के वो आएगा फिर से,

मैं सदियों से यूँ रातों को जगा हूँ।


कहीं तकमें कहीं गाली जहां में,

कहीं तम हूँ कहीं पर मैं दिया हूँ ।


मुहब्बत है लहू में जानता हूँ,

मगर मैं दुश्मनों में फ़ासला हूँ ।


वो जल्दी आएगा वादा किया था,

न आया कब्र में कब से पड़ा हूँ ।


----हर्ष महाजन 'हर्ष'


बह्र:

1222 1222 122

*अकेले हैं चले आओ जहाँ हो ।*

Sunday, June 13, 2021

दिल में रखा जो तूने मेरे लिए सज़ा सा

 ***


अब राज़ क्या है मुझको ज़ाहिर करो ज़रा सा,

दिल में रखा जो तूने मेरे लिए सज़ा सा ।


ये चश्म-ए-अश्क़ देखो, क्या मर्ज़ की दवा है,

हो टीस जिसके दिल में, पूछो उसे नशा सा ।


अब जिस तरफ भी देखूँ तन्हाई का है आलम,

है ज़िन्दगी में तेरे किरदार अब ज़रा सा ।


यूँ महफिलों से मेरा है उठ चुका भरोसा,

पर जानता हूँ मेरा, दिल है जला जला सा ।


उनका था ज़िन्दगी में मुझको फ़क़त सहारा,

अनजान हो के उसने, ख़ुद को किया ज़ुदा सा ।


-----हर्ष महाजन 'हर्ष'


221 2122 221 2122

पर निगाहों से गिरें कैसे उठा लूँ यारो


खाके ठोकर जो गिरें वो तो सँभालूँ यारो,

पर निगाहों से गिरें कैसे उठा लूँ यारो ।


सोहबत से भी करें जिनकी हैं परहेज अगर,

अपनी महफ़िल में उन्हें कैसे बुला लूँ यारो ।


दुश्मनी रख के मेरे काम बहुत आता है,

ख़त को क़ासिद के लिए छत से गिरा लूँ यारो ।


देखो वो चाँद फ़लक से मेरी छत पे आया,

अपने जज़्बात बता कैसे सँभालूँ यारो ।


फैसले के लिए उसने था बुलाया मुझको,

दिल में क्या बात कहा बात बता लूँ यारो ।


आस्तीनों में यूँ साँपों को मैं झेलूँ कैसे,

दो इज़ाज़त तो ज़रा बीन बजा लूँ यारो ।


'हर्ष' आया है मेरे शह्र मिला दे कोई,

अपनी सोई हूई तकदीर जगा लूँ यारो


हर्ष महाजन 'हर्ष'


2122 1122 1122 22(112)

तर्ज़/बह्र: होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा ।

Saturday, June 12, 2021

बात जो दिल में फसी बाहर उछालो लोगो


बात जो दिल में फसी बाहर उछालो लोगो,

जो लगी आग अपने दिल से निकालो लोगो ।


रहनुमा बन के जिन्हें अपने मिटाने आये,

अब तो आँखों से वो पर्दा उठा लो लोगो ।


कौन है अपना यहाँ कौन पराया समझूँ,

कोई पत्थर तो न अपनों पे उछालो लोगो ।


थे तलबगार ओ फिदा उनकी अदाओं पे मगर,

अब वो रूठे हैं चलो उनको मना लो लोगो ।


जो सलीके से न समझेंगे कयामत होगी,

बेवज़ह बहकते अरमान सँभालो लोगो ।


टूटकर शाख़ से जो फूल गिरा करते हैं,

पाँव से मसले कोई उनको उठा लो लोगो ।


होके शर्मिंदा जिन्हें लौट कर जाना होगा,

'हर्ष' की महफिलों में उनको बुला लो लोगो ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'


बह्र: रमल मुसम्मन मख्बून महजूफ

2122 1122 1122 112(22)

दिल की आवाज़ भी सुन.........

Monday, May 31, 2021

क्युं अपने सभी याद आने लगे हैं

 ***


क्युं अपने सभी याद आने लगे हैं,

दिया दुश्मनी का जलाने लगे हैं ।


वो चुपके से सर रख के काँधे पे उनके,

वफ़ा नफ़रतों की बढ़ाने लगे हैं ।


हवाओँ में फिर आँधियों सी ख़बर है,

वो आइनों पे पत्थर चलाने लगे हैं ।


ये कैसे मुसलसल वो ऑंसू थमेंगे,

यूँ अपनों के ऐसे निशाने लगे हैं ।


दिया जब बुझा देखकर उनके घर का,

ख़बर थी महल को सजाने लगे हैं ।


बस्ती में अपनी नए ज़ख्म देखो,

वो गैरों को अपना बताने लगे हैं ।


कहूँ काल उनको या कर्मों का लेखा,

चिता से दिए वो जलाने लगे हैं ।


नहीं फ़ायदा बंदगी का ख़ुदा की ,

हवाओं से पुल वो बनाने लगे हैं।


ज़ुबाँ ज़ह्र उगलेगी इतना पता था,

ये किरदार सच में निभाने लगे हैं ।


-----हर्ष महाजन 'हर्ष'

Friday, May 21, 2021

हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो

 ◆◆◆


हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो,

अपने साहिल को भी तुम अपना बताना छोड़ दो ।


अर्थियों के संग भी अपना कोई दिखता नहीं,

आज से अपनों पे अपना हक जताना छोड़ दो ।


जब तलक दस्तक न दे वो दर्द तेरे द्वार पे,

ज़िन्दगी की खुशियों को यूँ ही गँवाना छोड़ दो ।


अस्पतालों से निकलती लाशों को देखो ज़रा,

कह रहीं हैं अपनों से नफ़रत बढ़ाना छोड़ दो ।


ज़िन्दगी में ऐसा मंज़र आएगा सोचा न था,

आदमी से 'हर्ष' अब मिलना मिलाना छोड़ दो ।


-------हर्ष महाजन 'हर्ष'

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Sunday, May 16, 2021

ये कैसा वार मेरे यार करके छोड़ दिया

 ये कैसा वार मेरे यार करके छोड़ दिया,

मेरा नसीब क्यूँ बीमार करके छोड़ दिया ।


अभी-अभी तो गुलों में बहार होने को थी,

हवा को किसने गिरफ़्तार करके छोड़ दिया ।


ढली है शाम-ओ-सहर औऱ उम्र भी पल में,

हुए ज़ुदा तो गुनाहगार करके छोड़ दिया ।


वो बेवफ़ा भी कहें मुझको ये कबूल सही,

मगर है रंज मुझे प्यार करके छोड़ दिया ।


ज़ुदा हुए तो हुए इसका तो है ग़म लेकिन,

है ग़म तो उसका कि गुल **खार करके छोड़ दिया ।


लगी क्या आँख जरा सी वफ़ा भी भूल गए,

मेरा वज़ूद यूँ मझधार करके छोड़ दिया ।


ज़मी भी थम सी गयी आसमाँ ठहर सा गया,

यूँ मेरी हस्ती को बेकार करके छोड़ दिया ।


जो कद्र करता रहा उम्र भर तेरी लेकिन,

उसी चराग़ को बेज़ार करके छोड़ दिया ।


तवाफ़* करता रहूँ तेरे इर्द गिर्द लेकिन,

ये आस पास क्यूँ दीवार करके छोड़ दिया ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

1212 1122 1212 112(22)

Friday, May 7, 2021

अपनी कोई भी पुरानी चीज़ उठाकर देखिये


★★★


अपनी कोई भी पुरानी चीज़ उठाकर देखिये,

लुत्फ कितना आएगा बस आज़माकर देखिये ।


ज़िन्दगी में रंग कितने यूँ समझ में आएगा,

कोई भी नग्मा पुराना ख़ुद ही गाकर देखिये ।


मिल सकेगा तुमको भी लाखों दिलों का प्यार यूँ ,

बस किसी के जख्मों को मरहम लगाकर देखिये ।


कैसे अश्क़ों से भरा है आजकल हर आदमी,

हो सके काँधे पे उसका सर टिकाकर देखिये ।


हँसते हैं जो लोग किसी की मौत पर यूँ ही अबस,

कह दो कोई सपनों में अपना गँवाकर देखिये ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'

2122 2122 2122 212


★★आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे★★