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Friday, October 8, 2021

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं

 

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं, 
ज़ह्र देते है वो फिर खुद ही दवा देते है ।

खौफ़ दुनिया का है जो इश्क खता कहते हैं, 
करके शोला ये बदन फिर क्यूँ हवा देते हैं |

इश्क भी करते हैं वो ज़ह्र असर होने तक, 
ज़ख़्म भी देते हैं वो फिर क्यूँ दुआ देते हैं |

बे-वफ़ा है वो मगर दिल है कि मानेगा नहीं,
दर्द शेरों से मेरे दिल के हरा देते हैं |

'हर्ष" जब कहता है खुद को ही बगावत कर ले,
खुद यूँ हाथों की लकीरों को मिटा देते है ।

___हर्ष महाजन 'हर्ष'©
9 अक्टूबर 2012
2122 1122 1122 22

Friday, December 30, 2016

मुझको कल रात खूब याद आई तेरी

-------------नज़्म ( डोली )

मुझको कल रात खूब याद आई तेरी,
डोली अरमानों से थी.....सजाई तेरी ।

खुश थे हम भी मगर अश्क़ ले आँखों में,
हँसते रोते जो की थी......बिदाई तेरी ।

उस तरफ ढोल बाजे......नगाड़े बहुत,
पर यहां सूनी गलियां....ओ माई तेरी ।

दूर तक जाते तूने........जो देखा मुझे,
पल वो दादी बहुत.....याद आई तेरी ।

यूँ ही कागज़ पे आंसू ....बहाये बहुत,
मैंने जब-जब थी गुड़िया ..उठाई तेरी ।

ख्वाब टूटा तो दिल पे था बोझ लिये,
बिखरी तस्वीेर आँखों में.....छाई तेरी ।

टूटे ख़्वाबों ने इतना बताया मुझे,
मैंने बचपन की यादें  छुपाई तेरी ।

मेरे दिल से जुदा हो न पाई कभी,
घर की अलमारियों पे लिखाई तेरी ।

तुझको भूले से कुछ हो न जाए कभी,
अब खुदा से भी  कर ली दुहाई तेरी ।

दर्द आँचल से थोड़ा गिरा अब ज़रा,
दूर पापा तेरे संग.........है आई तेरी ।

ये नज़म लिखते ही इतना रोया हूँ मैं,
 साथ गुड़ियों के रातें बिताई तेरी ।

डोली अरमानों से थी.....सजाई तेरी,
मुझको कल रात खूब याद आई तेरी ।

------------हर्ष महाजन

बहर

212 212 212 212
1)"आपकी याद आती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कराती रही रात भर"

2) "खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी"

Monday, August 22, 2016

राह में शख्स वो मुस्कराते रहे,

पुरानी डायरी से......एडिट

-----------------नज़्म--------------

राह में शख्स......... वो मुस्कराते रहे,
दूर तक हमको.......वो याद आते रहे ।

हम भी थे अजनबी,वो भी थे अजनबी
तनहा-तनहा सफ़र....हम निभाते रहे।

दूर तक थी दिलों में..खलिश सी बहुत,
जब सफ़र टूटा......आँखें मिलाते रहे ।

ऐसे अनजान ज़ख्मों में....पीड़ा बहुत,
सोचकर अब तलक,  सर खुजाते रहे ।

हम मिलेंगे उसी,  मोड़ पर  सोच कर,
हर शबो रोज़........दीया जलाते रहे ।

हमसफ़र इस सफर से था अनजान यूँ,
पर वो शख्स दिल में घर को बनाते रहे ।

हमने जब जब ज़हन से, था पटका उन्हें,
पर वो ख्वाबों में....जुल्फें सजाते रहे ।

जान कर' हमसफ़र रिश्ता अंजान से,
सोच ये 'हर्ष'........ आंसू बहाते रहे ।

-----------–हर्ष महाजन

. बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
212-212-212-212