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इन आँखों की हँसी ने भी अजब बदलाव देखा है,
मगर दुनिया की नज़रों में वही ठहराव देखा है।
महकती थी जहाँ खुशबू मुहब्बत की फ़ज़ाओं में,
वहाँ अब नफ़रतों का हमने इक फैलाव देखा है।
मिले जो अजनबी बनकर उन्हीं से रब्त गहरा था,
मगर अपनों के लहज़े में नया बर्ताव देखा है।
छलकते थे जो आँखों से वफ़ा के अश्क बनकर अब,
उन्हीं आँखों ने रिश्तों में नया दूराव देखा है।
समझ ऐ 'हर्ष' अब नादाँ ज़माने की जफ़ाओं को,
कि इस संसार में हर सम्त ही बिखराव देखा है।
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हज़ज मुसम्मन सालिम
1222 1222 1222 1222
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