Friday, February 27, 2026

रात भर तेरे गम में चाक रहे

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रात भर तेरे गम में चाक रहे,

आँख भर-भर के जाम चलते रहे,


इक झलक पाने को तेरी अब तो,

यूँ ही चढ़-चढ़ के दाम चलते रहे |


क्यूँ ये रातें हैं अब अंधेरों सी,

चाँद छुप-छुप के क्यूँ निकलता है,


जिस तरह जल रहा था परवाना,

मेरे दिल से सलाम चलते रहे |


खौफ अब क्यूँ नजर नहीं आता,

इश्क जब गैरों में मचलने लगे,


दर्द उठ-उठ सकूं यूँ देता रहा,

जब तक उनके पयाम चलते रहे |


चाँद की चाहतों में दीवाना,

उम्र भर भटके बादलों की तरह ,


इश्क महफूज़ मैयतों में सदा,

जब वफाओं के जाम चलते रहे |


जब से उलझी हैं इश्क की राहें,

तुझको सजदे में हम पुकारा किये,


और पतझड़ में गिरते पत्तों पर,

तेरा लिख-लिख के नाम चलते रहे |


यूँ तो ये शहर बद-नसीबों का,

गम में भी करते शायरों से गिला,


है मगर ‘हर्ष’ बे-ख़बर शायर ,

फिर भी उनके कलाम चलते रहे |

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ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़

2122 1212 112

यूँ ही तुम मुझसे बात करती हो

तर्ज़--

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