◆◆
ढलने लगी ये सांझ तो मुझको भुला दिया,
इक ज़िंदगी ने ज़िंदगी को ही रुला दिया ।
वो जब मिले तो यूँ मिले इक ख्वाब की तरह,
दिल के मचलते प्यार में तूफाँ जगा दिया ।
लेकिन तू मुझको ये बता, मुझसे था क्या गिला,
इन साजिशों के शोलों में, दिल तक जला दिया ।
बदली की भाँति आये, बरस कर यूँ चल दिये,
मेरी हसीन चाह को, झटका लगा दिया ।
बे-वक़्त काली रात में, डूबे हैं इस तरह
ज्यूँ रोशनी को 'हर्ष' ने खुद ही दगा दिया ।
◆◆◆
➖➖➖➖➖➖
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
221 2121 1221 212
No comments:
Post a Comment