Tuesday, April 28, 2020

ये मुक़द्दर ख़ुदा जो आबाद किया (सूफियाना)



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ये मुक़द्दर ख़ुदा जो आबाद किया,
बेरुख़ी ज़िन्दगी को नॉशाद किया  ।

राह ये बन्दग़ी की आसाँ तो न थी,
तूने कर यूँ निग़ाह इरशाद किया ।

तन्हा सी ज़िन्दगी को तेरा ही सबब,
टूटे दिल को जो मेरे फौलाद किया ।

तूने दिल की उड़ान महफूज़ यूँ की,
आसमाँ तूने मेरा आज़ाद किया ।

जो था दिल में कभी, वो मेरा हो गया,
अब नसीबा ये कैसे इज़ाद किया ।

जो मेरा ऐ ख़ुदा वो तेरा ही तो है,
होंसिले से भी तूने तादाद किया ।

मैं तो मजबूर हूँ गुनाहों से मगर,
इस ख़तावार को तूने शाद किया ।

-हर्ष महाजन 'हर्ष'

2122 1212 2112

Monday, April 27, 2020

इक बावफ़ा मुहब्बत बदनाम करते करते(तरही)


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इक बावफ़ा मुहब्बत बदनाम करते करते,
कब तक कोई जियेगा सरे-आम करते-करते ।

वो आइना बना है  दुश्मन सा इस नगर में,
मंज़िल बता रहा है बदनाम करते-करते ।

लहरों का रुख़ समंदर में ख़िल गया अचानक,
बोझिल हुआ ख़ुदा को पैग़ाम करते-करते ।

वो बेवफ़ा था लेकिन दुश्मन मग़र नहीं था,
मैं रो रहा हूँ ग़ज़लें अंजाम करते-करते ।

इस भीड़ में हूँ तन्हा ताईद कर रहा हूँ,
ख़ुद को ही खो चुका हूँ नाकाम करते-करते ।

इक मेरा रंजोगम था बेपर्दा हो चुका जो,
बदनाम कर गया है इल्ज़ाम करते-करते ।

वो दूर तो नहीं है, पर शूल हैँ डगर में,
मैं थक गया हूँ मंज़िल गुलफ़ाम करते-करते ।

ज़िंदा तो हूँ मैं लेकिन, आराम कर रहा था,
कुछ औऱ थक गया हूँ आराम करते-करते ।*'

तन्हा सी ज़िन्दगी में, इक ख़्वाब ढूँढता था,
गुज़री है उम्र ख़ुद को सद्दाम  करते-करते ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2122 221 2122

Friday, April 24, 2020

मेरे यकीं को न नजरों से तुम गिरा देना


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मेरे यकीं को न नजरों से तुम गिरा देना,
कोई भी जुर्म अगर है तो फिर सज़ा देना ।

मैदान-ए-इश्क़ में तुझ सा कोई करीब नहीं,
करूँ बुरा भी कभी थोड़ा सा मुस्करा देना ।

मैं उन दिलों में भी धड़का हूँ जो पसंद नहीं,
ये कैसी आग है उलफ़त में तू बुझा देना ।

मेरी ग़ज़ल में कभी तुम भी बात अपनी करो,
रखूँगा मतले में तुझको मुझे बता देना ।

तड़प तड़प के ये दिल जाने कब तमाम हुआ,
तो क्या लिखा है मुक़द्दर में तुम सुना देना ।

कभी तुझे यूँ लगे अश्क़ चश्म पर भारी,
तो फिर नसीब के वो अश्क़ दो गिरा देना ।

सज़ा मिली है बहुत कुछ गुनाह औऱ मगर,
बिछुड़ के रोया बहुत और मत सज़ा देना ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1212 1122 1212 112(22)


24-04-2020

Wednesday, April 22, 2020

आज इक शख्स मुझे ख्वाब दिखाने आया

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आज इक शख़्स मुझे ख़्वाब दिखाने आया,
चाँद उतरा है ज़मी पर ये बताने आया ।

बेपनाह आंखों में अश्कों का सफ़ऱ रख बाकी ,
आज ख़त उसके मैं छत पे था जलाने आया ।

सिसकियाँ उठने लगीं दिल से जो काबू न हुईं,
मैं मुहब्बत के समंदर में नहाने आया ।

किसमें दम था कि मेरे दिल पे कोई घाव करे,
पर मुक़द्दर ही मेरा मुझको रुलाने आया ।

कुछ तो हाथों में लिए बैठे हैं खंज़र लेकिन,
इनमें इक दोस्त बचाने के बहाने आया ।

मेरी किस्मत में हमेशा से है धोख़ा यारो,
मैं भी खुल कर के उन्हें आज नचाने आया ।

ज़िन्दगी 'हर्ष' ने अब तक है जी अश्क़ों में मगर,
अब जो हिम्मत है तो मैं उसको बताने आया ।

-हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1122 1122 112(22)
दिल की आवाज़ भी सुन मेरे फ़साने पे न जा

मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ (तरही)

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दिल से इक किस्सा सुहाना चाहता हूं,
इक फ़क़त दिलभर बनाना चाहता हूँ ।

आज बगिया में खिले हैं फूल इतने,
बन के भँवरा खुद दिखाना चाहता हूं ।

आग पानी में लगा दूँ तुम कहो तो,
इन हवाओं को बताना चाहता हूँ ।

एक तितली उम्र भर पहलू में बैठे,
बन परिंदा मैं निभाना चाहता हूँ ।

देख लूँ तेरी अगर आँखों में  नफ़रत,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ।*

क्यूँ मुहब्बत दे नहीं सकते वो मुझको,
अब सफ़र मैं भी सुहाना चाहता हूं ।

क्या दिलों को रौंदकर सीखा है तुमने,
ग़ज़लों में अपनी उठाना चाहता हूँ।

---- हर्ष महाजन :हर्ष'
2122 2122 2122
छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा

Monday, April 20, 2020

ऐसी बस्ती में जाऊँ क्या (तरही)

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ऐसी बस्ती में जाऊँ क्या,
कातिल का घर बतलाऊँ क्या ।

कुछ खस्ता हालत में है वो,
थोड़ा झूटा हो जाऊँ क्या ।*

अब जंग के गहरे सागर में,
खुद ही कश्ती में आऊँ क्या ।

आते जो ख्वाबों में अक्सर,
उनको ये ग़म समझाऊँ क्या ।

हर पग पे उल्लू दिखता है,
ये कह उनको पछताऊँ क्या ।

बस दुश्मन से सत्ता छीनों,
ये सुन-सुन अब घबराऊँ क्या ।

हम किस माटी में जन्में है,
कुछ वो नग्में सुनवाऊं क्या ।

हमलों में सब कुछ उजड़ा है,
अब पीड़ा इक-इक गाऊँ क्या ।

किस घर में मातम छाया है,
छत पे दीया जलवाऊँ क्या ।

------------हर्ष महाजन 'हर्ष'
22-22-22-22
मैं पल दो पल का शायर

Sunday, April 19, 2020

बिना साज़ जो भी सजेगी ग़ज़ल

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बिना साज़ जो भी सजेगी ग़ज़ल,
वो धड़कन की धुन पे चलेगी ग़ज़ल ।

उठेगी कभी दिल से लब तक कभी,
यकीनन ज़ुबाँ पे सजेगी ग़ज़ल ।

अगर सांचे में ढ़ल न पाएँगे लफ्ज़,
तो बन के सज़ा वो खलेगी ग़ज़ल ।

चमन गर न बदला न बदली फ़िज़ा,
अंधेरों में खुद ही बनेगी ग़ज़ल ।

अगर ग़म समंदर हुआ अश्क़ों का
तो दिल में सुलगकर जलेगी  ग़ज़ल ।

कभी होगा आँखोँ से दिल तक सफर,
वही 'हर्ष' तुझको फलेगी ग़ज़ल ।

 हर्ष महाजन 'हर्ष'
122 122 122 12(22)

Wednesday, April 15, 2020

रुख़ से पर्दा उठा के देख लिया (तरही)

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रुख़ से पर्दा उठा के देख लिया,
बिजली दिल पे गिरा के देख लिया ।

घुटनों के बल जो चल सकूँ खुद ही,
उसने आंगन बना के देख लिया ।

टूटकर भी वो ज़िद्द पे था काबिज़, 
ख़ुद को अश्कों में ला के देख लिया ।

रौशनी फिर भी हो सकी न कभी,
दिल को दीया बना के देख लिया ।

उनका दिल से निकलना था वाज़िब ,
ये भी दिल को सुना के देख लिया ।

होगा मिलने से कुछ नहीं हासिल
*बा रहा आज़मा के देख लिया ।*

ज़ुल्फ़ें रूख़ पे गिरीं थी यूँ शायद,
चाँद उनमें छुपा के  देख लिया ।

कद्र जो कर सका बशर न कोई,
ऐसी दुनिया बसा के देख लिया ।

ज़ख्म दिल के सभी उभर आए
खुद ही पर्दा हटा के देख लिया ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1212 22(112)

बा-रहा=प्राय:

Sunday, April 12, 2020

तन्हा बैठे हो कुछ तो इशारा करो

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तन्हा बैठे हो कुछ तो इशारा करो, 
सोच अपनी कभी तो अवारा करो ।

जब कभी मॉज़ों में मन बहलने लगे,
तो समंदर में कश्ती उतारा करो ।

उम्र भर उँगलियों पे नचाया मुझे,
आज मौका है तुम भी तो हारा करो ।

खुशबुओं से अगर तरबतर ने लगूँ,
हक़ तुम्हें भी है दिल को अँगारा करो ।

शाम को जब कभी घर पे आया करो,
मेरी ज़ुल्फ़ों को खुद ही सँवारा करो ।

शेर तुम हो अगर, मैं हुँ तेरी ग़ज़ल ,
आज से गा के मुझको पुकारा करो ।

ज़ुल्म करके मुझे क़ैद कर लो अगर,
नज़्र से पी के सर पे भी वारा करो । 

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

Friday, April 10, 2020

हिन्द की दहलीज़ पर ऐसी फ़िज़ा रख जाऊँगा

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हिन्द की दहलीज़ पर ऐसी फ़िज़ा रख जाऊँगा,
मज़हबी खुश्बु से महकी इक वफ़ा रख जाऊंगा ।

सरहदों से आ रहे जो बीज नफ़रत के मगर,
मरक़ज़ों में मैं फ़िज़ाओं की हवा रख जाऊँगा ।

कौन जाने किस घड़ी खो जाए अब किसका सफ़र,
हर डगर पे मैं मुहब्बत का दिया रख जाऊँगा ।

गर यकीं तुमको निगाहें ग़ैर सी रखतें है तो,
आने वाली नस्ल पर इक हादसा रख जाऊँगा ।

रंग गर दरिया-दिली से बन्दग़ी का चढ़ गया,
टूटकर भी हर तरफ मैं इक नशा रख जाऊँगा ।

हादसों में बस्तियाँ गर नफ़रतों से भर गयीं,
रख यकीं मैं जंग का मक़सद नया रख जाऊँगा ।


-हर्ष महाजन 'हर्ष'

Saturday, April 4, 2020

किताब ए ज़िन्दगी में देखे थे ईमान के दुश्मन

...

किताब ए ज़िन्दगी में देखे थे ईमान के दुश्मन,
ज़माने भर के तबलीगी हुए इंसान के दुश्मन,

मिटा है इस कदर इस मुल्क से चैनो अमन देखो,
मुहब्बत भूल थी इनसे, हुए ये जान के दुश्मन ।

गुनाहों का ये आलम देखो तो इतने ये बे-गैरत,
सियासत ताक पे रख, हो गए फरमान के दुश्मन ।

ये सोचा था दिवारें मज़हबी हम तोड़ डालेंगे
मगर सद्भावना में हो रहे बलिदान के दुश्मन ।

सबाब ए इश्क की दौलत तो भारत में बहुत लेकिन,
उठी नफरत की ऐसी बाढ़ कि हलकान है दुश्मन ।

कि रोको अब तबाही के ये मंज़र ज़हर उगलेंगे,
पलट दो उनके मंसूबे जो हिंदोस्तान के दुश्मन ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222

Friday, April 3, 2020

सभी इस क़ज़ा में रज़ा हो गए ।


...

सभी इस क़ज़ा* में रज़ा* हो गए ।
मगर कुछ नमाज़ी ज़ुदा हो गए ।

मुहब्बत में हम किसी से कम तो नहीं,
मगर सरफिरे कुछ ख़फ़ा हो गए ।

जहाँ फ़ासलों पर अमल न हुआ,
वहाँ कुछ बशर* ग़मज़दा हो गए ।

जिन्हें मान अपना निभाते रहे,
वही हमवतन अब ख़ुदा हो गए ।

सियासत कहीं बेअसर तो नहीं ?
हैं कुछ शह्र में बा-ख़ता हो गए ।

यूँ सीने में अहसास जिनके नहीं,
हमारे लिए वो सज़ा हो गए ।

ख़तावार को गर सज़ा न हुई,
तो हम बे-ख़ता बे-हया हो गए ।

चलो मिट चलें अब अमन के लिये,
सभी हमनफस*, हमनवा* हो गए ।

ख़ुदा हमको ऐसी ख़ुदाई न दे,
जहाँ हुक्मरां ही सज़ा हो गए ।

------हर्ष महाजन 'हर्ष'
122 122 122 12
तुम्हारी नज़र क्यूँ खफा हो गयी ।
*********************
*क़ज़ा=कर्तव्यपालनता
रज़ा=राज़ी होना
बशर=आदमी
हमनफस=एक साथ सांस लेने वाले ।
हमनवा=एक साथ आवाज देने वाले

Wednesday, April 1, 2020

जो दिल्ली को मैयत बनाने लगे

...

जो दिल्ली को मैयत बनाने लगे, 
वो मरकज़ में महफ़िल सजाने लगे ।

वो कैसी थी मस्ज़िद थी कैसी दुकाँ,
जहां लौ से लौ वो जलाने लगे ।

हकीकत परखने को राजी न थे,
वो पतझड़ सा खुद को गिराने लगे ।

हुए रूबरू तो मिले कुछ निशाँ,
बिना जंग लाशें बिछाने लगे ।

ज़नाजे बहुत निकलेंगे अब यहाँ,
हवा के थपेड़े बताने लगे ।

---------हर्ष महाजन 'हर्ष'

122 122 122 12
बहारों ने मेरा चमन लूट कर