Monday, April 27, 2020

इक बावफ़ा मुहब्बत बदनाम करते करते(तरही)


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इक बावफ़ा मुहब्बत बदनाम करते करते,
कब तक कोई जियेगा सरे-आम करते-करते ।

वो आइना बना है  दुश्मन सा इस नगर में,
मंज़िल बता रहा है बदनाम करते-करते ।

लहरों का रुख़ समंदर में ख़िल गया अचानक,
बोझिल हुआ ख़ुदा को पैग़ाम करते-करते ।

वो बेवफ़ा था लेकिन दुश्मन मग़र नहीं था,
मैं रो रहा हूँ ग़ज़लें अंजाम करते-करते ।

इस भीड़ में हूँ तन्हा ताईद कर रहा हूँ,
ख़ुद को ही खो चुका हूँ नाकाम करते-करते ।

इक मेरा रंजोगम था बेपर्दा हो चुका जो,
बदनाम कर गया है इल्ज़ाम करते-करते ।

वो दूर तो नहीं है, पर शूल हैँ डगर में,
मैं थक गया हूँ मंज़िल गुलफ़ाम करते-करते ।

ज़िंदा तो हूँ मैं लेकिन, आराम कर रहा था,
कुछ औऱ थक गया हूँ आराम करते-करते ।*'

तन्हा सी ज़िन्दगी में, इक ख़्वाब ढूँढता था,
गुज़री है उम्र ख़ुद को सद्दाम  करते-करते ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2122 221 2122

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