Friday, April 10, 2020

हिन्द की दहलीज़ पर ऐसी फ़िज़ा रख जाऊँगा

***
हिन्द की दहलीज़ पर ऐसी फ़िज़ा रख जाऊँगा,
मज़हबी खुश्बु से महकी इक वफ़ा रख जाऊंगा ।

सरहदों से आ रहे जो बीज नफ़रत के मगर,
मरक़ज़ों में मैं फ़िज़ाओं की हवा रख जाऊँगा ।

कौन जाने किस घड़ी खो जाए अब किसका सफ़र,
हर डगर पे मैं मुहब्बत का दिया रख जाऊँगा ।

गर यकीं तुमको निगाहें ग़ैर सी रखतें है तो,
आने वाली नस्ल पर इक हादसा रख जाऊँगा ।

रंग गर दरिया-दिली से बन्दग़ी का चढ़ गया,
टूटकर भी हर तरफ मैं इक नशा रख जाऊँगा ।

हादसों में बस्तियाँ गर नफ़रतों से भर गयीं,
रख यकीं मैं जंग का मक़सद नया रख जाऊँगा ।


-हर्ष महाजन 'हर्ष'

No comments:

Post a Comment