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दिन भी हुआ धुआँ-धुआँ, रातें हुईं खलास,
अब आदमी के बीच में है आदमी उदास।
रहबर ही जब न मुल्क में छोड़ें कोई कसर,
पहने हुए हैं जिस्म पे सब काग़ज़ी लिबास।
फूँका किए हैं दूसरों के घर जो अब तलक,
अब अपने ही मकाँ का नहीं होता है अभास।
वादों का क्या कि काँच हैं, बस एक ठेस से,
टूटेंगे इस तरह से कि होगा नहीं उजास।
शिकवों के डर से आज भी मिलते नहीं हैं लोग,
इस शहर-ए-बे-हिसी में भला 'हर्ष' किसकी आस।
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शहर-ए-बे-हिसी=भावनाओं से रहित शहर
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