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कोई मय मिली न ही हम-सफर,
कोई मैकदा भी मिला नहीं,
जो फ़ज़ा में घोल पिलायेगा,
कोई ऐसी दिल की दवा नहीं ।
वो तो ख्वाब था जो धुआँ हुआ,
जो मिला भी था वो फ़ना हुआ,
ये अजब सज़ा थी नसीब में,
कोई रास्ता भी दिखा नहीं ।
ये मुसाफिरों के हजूम में,
यहां कौन कितना अमीर है,
जो बुझा सके मेरी तिश्नगी,
कोई ऐसा भी तो मिला नहीं ।
कोई आके मझको करीब से,
सर-ए-राह मिल के बताएगा ?
ये जो बे-वफ़ा था मिला मुझे,
हुआ 'हर्ष' से क्यूँ ज़ुदा नहीं ।
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Kaamil murabba saalim
11212 11212
"न किसी की आँख का नूर हूँ"
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