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रात भर तेरे गम में चाक रहे,
आँख भर-भर के जाम चलते रहे,
इक झलक पाने को तेरी अब तो,
यूँ ही चढ़-चढ़ के दाम चलते रहे |
क्यूँ ये रातें हैं अब अंधेरों सी,
चाँद छुप-छुप के क्यूँ निकलता है,
जिस तरह जल रहा था परवाना,
मेरे दिल से सलाम चलते रहे |
खौफ अब क्यूँ नजर नहीं आता,
इश्क जब गैरों में मचलने लगे,
दर्द उठ-उठ सकूं यूँ देता रहा,
जब तक उनके पयाम चलते रहे |
चाँद की चाहतों में दीवाना,
उम्र भर भटके बादलों की तरह ,
इश्क महफूज़ मैयतों में सदा,
जब वफाओं के जाम चलते रहे |
जब से उलझी हैं इश्क की राहें,
तुझको सजदे में हम पुकारा किये,
और पतझड़ में गिरते पत्तों पर,
तेरा लिख-लिख के नाम चलते रहे |
यूँ तो ये शहर बद-नसीबों का,
गम में भी करते शायरों से गिला,
है मगर ‘हर्ष’ बे-ख़बर शायर ,
फिर भी उनके कलाम चलते रहे |
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ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़
2122 1212 112
यूँ ही तुम मुझसे बात करती हो
तर्ज़--
वाह
ReplyDeleteमेरी रचना को सम्मान देने के लिए साधुवाद !!🛑🛑
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