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तिरी एक ही नज़र से मेरा दिल मचल न जाये,
कि पिघल के मोम जैसा ये वजूद ढल न जाये ।
मिरी आँख का सितारा तिरी राह देखता है,
कोई अश्क बन के पलकों से यूँ ही फिसल न जाये।
तिरी याद का चराग़ाँ मिरी रूह में सजा है,
जो थिरक रही है लौ ये कहीं बुझ के जल न जाये।
अभी मुस्कुरा के देखो, अभी दिल को थाम लो तुम,
ये हसीं जो ख़्वाब देखा कहीं अब बदल न जाये।
मिरे ज़ब्त का सफ़ीना, किसी मौज की है ज़द में,
कहीं तेज़ धड़कनों से मेरा जी बहल न जाये।
तिरी सुर्ख़ शोख़ नज़रों का असर है आग जैसा,
कहीं आरज़ू का पंछी अभी पर निकल न जाये।
ये जो इश्क़ की तपिश है, ये जो हिज्र की अगन है,
इसे 'हर्ष' और हवा दो कि ये आग जल न जाये।
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रमल मुसम्मन मशकूल
1121 2122 1121 2122
👉तर्ज़-
मैं तुम्हीं से पूछती हूँ, मुझे तुमसे प्यार क्यों है
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