Saturday, August 7, 2021

गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,

गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,
हम मुहब्बत में हैं लेकिन दुश्मनी करते रहे |

दिल तो था मजबूर लेकिन आँखे आब-ए-चश्म थीं,
पर कदम बढ़ते रहे उनके सितम चलते रहे |

हर सितम आखों में उनकी आइने सा यूँ छला,
हम भी पहलू में दिया बन जलते अर बुझते रहे |

इश्क में खुद शूल बन वो सीने में चुभने लगे,
फिर वही ग़म ज़िंदगी में घुँघरू बन बजते रहे |

कैसे लिख दें दास्ताँ अपने ही लफ़्ज़ों में सनम,
ग़म समंदर हो चले अब दिल में जो पलते रहे |

_______हर्ष महाजन 'हर्ष'

आब-ए-चश्म = आंसू

बहरे रमल मुसम्मन महजूफ
2122-2122-2122-212



12 comments:

  1. आपकी लिखी रचना सोमवार 9 ,अगस्त 2021 को साझा की गई है ,
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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    1. मेरी कृति का लिंक "पांच अंकों में" देने के लिए तहे दिल से शुक्रिया आपको ।
      सदर

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  2. आपने मेरे ब्लॉग पर लिंक भेजने की बात कही थी तो फेसबुक पर या मैसेंजर पर बहुत सारे आपके नाम से लोग हैं । आप मेल पर भेज दीजिएगा लिंक ।
    sangeetaswarup@gmail.com

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    1. जी हां आज ही भेजता हूँ आपको लिंक ।
      सादर

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  3. हर सितम आखों में उनकी आइने सा यूँ छला,
    हम भी पहलू में दिया बन जलते अर बुझते रहे |

    बहुत सुंदर गज़ल सर।
    सादर।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरनीय स्वेता सिंह जी ।
      सादर

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  4. बहुत सुंदर नायाब गजल।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरनीय जिज्ञासा जी ।
      सदर

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  5. Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरनीय ।

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  6. इश्क में खुद शूल बन वो सीने में चुभने लगे,
    फिर वही ग़म ज़िंदगी में घुँघरू बन बजते रहे |
    कैसे लिख दें दास्ताँ अपने ही लफ़्ज़ों में सनम,
    ग़म समंदर हो चले अब दिल में जो पलते रहे |//
    सिर्फ एक शब्द लिखना चाहूंगी हर्ष जी --
    वाह !!!!!!!!!!!

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  7. वाह!!!
    लाजवाब गजल।

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