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Tuesday, August 30, 2016

नफरत है उस शहर से...जिस-जिस शहर तू गुजरा

शर्मसार

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नफरत है उस शहर से...जिस-जिस शहर तू गुजरा,
तूफां में "दाना मांझी".....क्या-क्या कहर तू गुज़रा |

क्या-क्या दिया तुझे अब..इस ख़िल्क़त-ए-शहर ने,
काँधे पे ले मुहब्बत.............पी-पी ज़हर तू गुजरा |

है आफरीन ज़ज्बा..................चर्चे हैं हर शहर में,
ये ज़िन्दगी में उठती....जिस-जिस लहर तू गुजरा |

ये हादसा नहीं पर............अरमां का था कतल ये,
हर दिल खिजाँ लिए था जिस-जिस शहर तू गुजरा |

लिक्खी बहुत यूँ ग़ज़लें.......ज़हन की बस्तियों पर,
हर शख्स आज रोया......अब जिस बहर तू गुज़रा |


______हर्ष महाजन

( ख़िल्क़त-ए-शहर = शहर के लोग/ जन-समूह )

221 2122 221 2122
मुजारी मुसम्मन अखरब