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Wednesday, December 28, 2016

कहूँ मैं कैसे मुझे खुद पे इख्तियार नहीं,

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कहूँ मैं कैसे मुझे खुद पे इख्तियार नहीं,
लगे है दुनियाँ में अब मेरा कोई यार नहीं ।

ये दिन ये रात कई इस खिजां में बीते मगर,
ये अश्क़ आज भी आँखों में गिरफ्तार नहीं ।

किसी पे वक़्त कहाँ पूछे मुझसे हाल यहां,
ये आशियाँ है जहां अब तलक बहार नहीं ।

ये अश्क़ निकलें तो दर्दे गुबार निकलेगा यूँ,
मगर हैं ख्वाब जो आँखों को ऐतबार नहीं ।

ये दर्द ए सहरा बना दिल भी 'हर्ष'आज तेरा,
किसी कली को याँ खिलने का इंतज़ार नहीं ।

-----------हर्ष महाजन

बहर
1212 1122 1212 112