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Saturday, July 30, 2016

ज़िक्र खुद अपने गुनाहों पे किया करता हूँ



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ज़िक्र खुद अपने गुनाहों पे किया करता हूँ,
कुछ सवालात सजाओं पे किया करता हूँ |

जब भी अल्फासों से लुट कर मैं गिरा हूँ इतना,
खुद मैं इज़हार खताओं पे किया करता हूँ |


लोग कहते हैं ये शीशे से भी नाज़ुक है दिल,
अब मैं हर बात दुआओं पे किया करता हूँ |


दिल था बेताब सुनूँ अब मैं सदायें उनकी,

पर गिला मैं भी हवाओं पे किया करता हूँ |

अब तो बतला दे मेरा उनको ठिकाना कोई,
मैं जिकर अब भी जफाओं पे किया करता हूँ
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हर्ष महाजन

2122 1122 1122 22