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Monday, July 4, 2016

अपनी मंजिल के लिए होश-ओ-खबर खो के चले

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अपनी मंजिल के लिए होश-ओ-खबर खो के चले,
दुश्मनी शौक़ नहीं पर वो मगर बो के चले |

मुब्तिला इश्क में वो....भूल गये सारे अदब,
भूल कर शाख-ए-वफ़ा वो बे असर हो के चले |

वो फलक छूने लगा जौक-ए-सितम जाने ये क्यूँ,
यूँ बिखर हम भी गये वो भी मगर रो के चले |

इश्क शोला तो हुआ......ताप मगर टूट गया,
हम पे बीती भी बहुत और जनम खो के चले |

हैं छुपे घाव मेरे अब न समझ पाये कोई,
रूह जब छोड़ चली जिस्म सभी ढो के चले |


हर्ष महाजन
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मुब्तिला = मसरूफ
जौक-ए-सितम = अत्याचार सहने का शौक़

2122 / 1122 / 1122 / 112
(रमल मुसम्मन मखबून महजूफ)

*हम से आया न गया तुमसे बुलाया न गया | *
*कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा |*