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Tuesday, February 20, 2018

यूँ न आंखों से बातें किया कीजिये

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यूँ न आंखों से बातें किया कीजिये,
इश्क़ का यूँ सबक न दिया कीजिये ।

हम तो नादान हैं प्यार में कुछ सनम,
तुम खबर कुछ तो दिल की लिया कीजिये ।

गम की ग़ज़लें चलें अश्क़ तुम थाम कर,
टूटे दिल को न यूँ ही सिया कीजिये ।

हम तो डरते हैं बदनामी से शहर में,
इश्क का तुम ज़िकर न किया कीजिये । 

गम की गहराइयों से जो गुज़रो कभी,
इल्तिजा अश्क तुम न पिया कीजिये ।

फासला दरमियाँ अब हमारे कहां,
फासलों में सनम न जिया कीजिये ।

जब भी आंखों से टपके नशा प्यार का,
हम नज़र से पिलाएं पिया कीजिये ।

----------------हर्ष महाजन

बहरे-मुतदारिक मसम्मन सालिम
212 212 212 212

1) मेरे रश्के क़मर तू ने पहली नज़र 
जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया

2) हर तरफ़ हर ज़गह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी.

Monday, July 17, 2017

दाग तुम लगने न देना घर की उजली साख पर

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दाग तुम लगने न देना घर की उजली साख पर,
बे-असर कर देना हों जब तल्खियां बे बात पर ।

कुछ सियासी दांव हैं अपने भी खेलें गैर भी,
हो हुनर अपने में इतना घर बना ले राख पर ।

चल पड़ीं गर नफ़रतें तो, दर्द-ए-सर हो जाएंगी,
फिर सिमट जाएंगे अपने अपनी-अपनी शाख पर ।

गर हुनर खुद में हो इतना भर मुहब्बत रिश्तों में,
बे-असर हो जाएगी दौलत तू रख दे ताक पर ।

बन शज़र रखना नज़र अपनों पे औ गैरों पे भी,
वर्णा रिश्ते रिश्ते क्या मचले जो हर जज़्बात पर ।

----------------------हर्ष महाजन

2122 /2122 /2122/ 212

Sunday, July 16, 2017

आज भारत की जमीं पर ऐसा क्यूं आतंक है

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आज भारत की जमीं पर ऐसा क्यूं आतंक है,
अपनो का गैरों से मिलके साजिशों का रंग है ।

कौन किसके दर्द की रक्खे खबर इस देश में,
हर तरफ आतंकी हमले हर तरफ हुड़दंग है ।

बाहरी दुश्मन की ज़रूरत हिन्द को अब है कहाँ,
अपना हर नेता उजड कर बन रहा आतंक हैं ।

जो बहाते खून उनके हौंसले हैं क्यूं बुलंद,
है पता उनको यहां सर्पों सी फ़ौजें संग है ।

जिस तरह अब मौत का तांडव मचा है घाटी में,
मर रहे आतंकी पर तड़पे हैं वो जो भुजंग है ।

-------------------हर्ष महाजन 'हर्ष'

Thursday, February 2, 2017

तनहा सी ज़िन्दगी में, वो बात ढूंढते हैं

एक पुरानी कृति एडिट के साथ....

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तनहा सी ज़िन्दगी में, इक बात ढूंढते हैं,
कब चाँद डूबा अपना, वो रात ढूंढते हैं |

कुछ लफ़्ज़ों से हुआ है मेरा वजूद खारिज,
किरदार खेला कैसे वो बात ढूंढते हैं |

मैं हूँ परेशाँ इतना तुम भी तो कम नहीं हो,
फुर्सत से मिलके दोनों जज़्बात ढूंढते हैं |

हरदम रहा तू शामिल, बरबादियों में मेरी,
ये हादसा हुआ क्यूँ, हालात ढूंढते हैं |

ऐ नींद कर सफ़र तू ख़्वाबों की वादियों में,
फिर इश्क की डगर के स्वलात ढूंढते हैं |

हर्ष महाजन


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बहरे मुजारी मुसम्मन अखरब (शिकस्ता )
221-2122 // 221-2122
*इन्साफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के |
*सारे जहाँ से अच्छा हिन्दूसितां हमारा |
*गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है |
*ये ज़िंदगी के मेले दुनियां में कम न होंगे |
*ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले |
*गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा |
*तकदीर का फ़साना जाकर किसे सुनाएँ |



Sunday, January 29, 2017

दिल को ऐसे ही सज़ा देता हूँ मैं

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दिल को ऐसे ही सज़ा देता हूँ मैं,
खत सभी उनके जला देता हूँ मैं ।

गर ग़ज़ल अच्छी लगे उनको कभी,
जल्द कागज़ से हटा देता हूँ मैं ।

आग जब दिल से कभी बुझने लगे,
सूखे ज़ख्मों को हवा देता हूँ मैं ।

जाने क्यूँ उनको दुआ दी मैंने आज,
बात जिनकी खुद भुला देता हूँ मैं ।

आज फिर ख़ूने ज़िगर जलता है क्यूँ,
आग जब दिल की बुझा देता हूँ मैं ।

चाह गर अखबार में सुर्खी बनूँ,
हादसा हो अब दुआ देता हूँ मैं ।

-----------–हर्ष महाजन

बहर
2122 - 2122 - 212
बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़

*आपके पहलू में आकर रो दिए
        *दिल के अरमां आंसुओं में बह गये
        *तुम न जाने किस जहाँ में खो गये |
       

Wednesday, January 11, 2017

कोई अश्कों से ये पूछे क्यूँ लरजें खूब पलकों पर


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कोई अश्कों से ये पूछे क्यूँ लरजें खूब पलकों पर,
कहीं दिल को है गहरी चोट आये खुद न सड़कों पर |

कहीं कुछ वोट की खातिर कहीं कुछ नोट की खातिर,
कहीं मैखानों में बिकते हैं हलके लोग हलकों पर |

कहीं ऐसा न हो तस्वीर दिल में खुद बदल जाए,
न उठ जाए कहीं एतबार किस्मत की लकीरों पर |

कोई बरसात ऐसी हो जो पानी को ही मय कर दे,
शहर बन जाएगा जंगल लगेगी भीड़ नलकों पर |

अगर फरहाद कोई शहर का सरताज हो जाए,
न उजड़े कोई भी दिलभर करेंगे राज़ मुल्कों पर |


_____________हर्ष महाजन
बहर :-
1222 1222 1222 1222

Sunday, January 8, 2017

हर तरफ रस्में निभा मुजरिम सा क्यूँ दिखता हूँ मैं


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हर तरफ रस्में निभा मुजरिम सा क्यूँ दिखता हूँ मैं,
जाने इतना कागजों पर दर्द क्यूँ लिखता हूँ मैं |
.
छू के भी देखी बुलंदी आसमां की थी कभी,
अब समंदर में यूँ दरिया बनके क्यूँ छिपता हूँ मैं |

इतनी उल्फत इतनी चाहत रिश्तों में दस्तूर भी,
है चमन इतना हसीं तो वीराँ क्यूँ दिखता हूँ मैं |

शख्स जिनकी रूह तक खौला किया मेरे लिए,
था शज़र तो शाख बन अब ऐसे क्यूँ झुकता हूँ मैं |

हर तरफ जब साजों पर चलती मुसलसल इक ग़ज़ल,
तो उतर कर हर्फों में ऐ ‘हर्ष’ क्यूँ बिकता हूँ मैं |

हर्ष महाजन


बहर ..
2122 2122 2122 212