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Tuesday, April 17, 2018

ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा

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ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा ,
लौट कर आये महब्बत में वफ़ा ।

दूरियाँ मिटती नहीं अब क्या करें,
कोई मिलने का निकालो रास्ता ।

चिलचिलाती धूप में आना सनम,
गुदगुदाती है तुम्हारी ये अदा ।

ज़ख्म दिल के देखकर रोते हैं हम,
याद आये इश्क़ का वो सिलसिला

तज्रिबा इतना है सूरत देख कर,
ये बता देते हैं कितना है नशा ।

वो लकीरों में था मेरे हाथ की,
मैं ज़माने में उसे ढूँढा किया ।

अश्क़ हमको दरबदर करते रहे,
जब तलक़ था दरमियाँ ये फ़ासला ।

दिल के अरमाँ छू रहे हैं अर्श अब,
आपने जब से दिया है हौंसला ।

वो रकीबों में उलझ कर रह गए,
बेगुनाही की मुझे देकर सज़ा ।

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हर्ष महाजन
2122 2122 212
आपके पहलू में आकर रो दिए

Sunday, April 15, 2018

ऐ खुदा मुझको ये होंसिला चाहिए


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ऐ खुदा मुझको ये होंसिला चाहिए,
 किस तरह तू मिलेगा दुआ चाहिए ।

उठ चुका है समंदर में ऐसा भँवर,
कश्तियों को कोई रहनुमा चाहिए ।

गर्दिश-ए-दौरां का हूँ मैं मारा हुआ,
बक्श दे अब तेरा आसरा चाहिए ।

तेरे दर पे झुका हूँ झुका ही रहूँ,
इतनी तौक़ीर की इब्तिदा चाहिए ।

ज़ख्म इतने मिले दर्द शाम-ओ-सहर,
हो असर कोई ऐसी दवा चाहिए ।

चाँद दिखता नहीं बदलियाँ हैं बहुत,
दे झलक ऐसा इक आइना चाहिए ।

तू मुहब्बत करे मैं भी सज़दा करूँ
हमको ऐसा कोई सिलसिला चाहिए ।

गर हुआ महफिलों में कहीं ऐसा ज़िक्र,
सरफिरों से मुझे फ़ासिला चाहिए । 

ज़िन्दगी में बचा मुक्तसर सा सफर,
प्यार में 'हर्ष' अब इंतिहा चाहिए ।

हर्ष महाजन
212 212 212 212

Sunday, April 8, 2018

ज़ुदा हुआ पर सज़ा नहीं है


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ज़ुदा हुआ पर सज़ा नहीं है,
न ये समझना ख़ुदा नहीं है ।

ज़रा सा नादाँ है इश्क़ में वो,
सबक़ वफ़ा का पढ़ा नहीं है'

दिखाऊँ कैसे मैं दिल के अरमाँ , 
चराग दिल का जला नहीं है ।

है दर्द गम का सफर में अब तक,
कि अश्क़ अब तक गिरा नहीं है ।

न वो ही भूले ये दिल दुखाना,
यहाँ अना भी खुदा नहीं है ।

न देना मुझको ये ज़ह्र कोई,
हुनर तो है पर नया नहीं है ।

लिपट जा आकर तू ऐ महब्बत,
जनाज़ा रुख़्सत हुआ नहीं है ।

---हर्ष महाजन

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बहरे-मुतका़रिब मुज़ाहफ़ की 8 में से एक शक्ल
🌸 वज़्न-- 121 22 -- 121 22
🌸 अर्कान- फ़ऊन फ़ालुन-- फ़ऊन फ़ालुन
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Saturday, April 7, 2018

बसती है मुहब्बतों की बस्तियाँ कभी-कभी


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बसती है मुहब्बतों की बस्तियाँ कभी-कभी,
रौंदती उन्हें ग़मों की तल्खियाँ कभी-कभी ।
ज़िन्दगी हूई जो बे-वफ़ा ये छोड़ा सोचकर,
डूबती समंदरों में कश्तियाँ कभी-कभी ।
गर सफर में हमसफ़र मिले तो फिर ये सोचना,
ज़िंदगी में लगती हैं ये अर्जियाँ कभी-कभी ।

उठ गए जो मुझको देख उम्र का लिहाज़ कर,
मुस्कराता देख अपनी झुर्रियाँ कभी-कभी ।
इश्क़ में यकीन होना लाजिमी तो है मगर,
दूर-दूर दिखती हैं ये मर्ज़ियाँ कभी-कभी ।

ज़िन्दगी में दोस्ती का आज भी मुकाम है,
फुरकतें भी लाज़िमी हैं दरमियाँ कभी-कभी ।
बेदिली की आग में वो छोड़ गए थे साथ जब,
सुनता हूँ सदाओं में वो सिसकियाँ कभी-कभी ।
डोलता नहीं हूँ देख शोखियाँ भरा ये दिल,
पर लुभायें ज़ुल्फ़ की ये बदलियाँ कभी-कभी ।

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हर्ष महाजन
212 1212 1212 1212

Thursday, March 29, 2018

वो मेरा हुस्न औ वफ़ा हूँ मैं

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वो मेरा हुस्न औ वफ़ा हूँ मैं,
उसकी यादों में मुब्तिला हूँ मैं ।

चाँद बदली में छुप रहा लेकिन,
माना उसने कि बा-वफा हूँ मैं।

राहे तूफान में फँसी कश्ती,
ऐसी राहों में सँग चला हूँ मैं ।

दिल से नादाँ हूँ ये कहा उसने,
उसकी चाहत का सिलसिला हूँ मैं

तिरछी नज़रों से देखना उसका,
बुझ के हर बार ही जला हूँ मैं । (गिरह)

ग़ैर रखकर किए थे ज़ुल्म बहुत,
मेरे अपनों का ही छला हूँ मैं।

मेरे हाथों की कुछ लकीरों ने,
लिख दिया मुझको इक बला हूँ मैं 

इतना गिर-गिर के संभला हूँ लेकिन,
अब तलक़ कितनों को ख़ला हूँ मैं 

-------हर्ष महाजन
2122 1212 22/122

Tuesday, March 27, 2018

दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो

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दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो,
महफ़िल भी हो ग़ज़लें भी हों फिर साज़ क्यूँ न हो ।

है प्यार अगर जुर्म मुहब्बत क्यूँ बनाई,
गर है खुदा तुझमें तो वो, हमराज़ क्यूँ  न हो ।

रखते हैं नकाबों में अगर राज़-ए-मुहब्बत,
जो हो गई बे-पर्दा तो आवाज़ क्यूँ न हो ।

दुश्मन की कोई चोट न होती है गँवारा,
गर ज़ख्म देगा दोस्त तो नाराज़ क्यूँ न हो ।

संगीत की तरतीब में तालीम बहुत है,
फिर गीत ग़ज़ल में सही अल्फ़ाज़ क्यूँ न हो ।

झेला है उसने इश्क़-ए-समंदर में पसीना,
वो ईंट से रोड़ा बना अंदाज़ क्यूँ न हो ।

इंसान की औलाद हूँ, न हिन्दू मुसलमाँ,
है 'हर्ष' मेरा नाम तो फ़ैयाज़ क्यूँ न हो ।

-----------हर्ष महाजन
221 1221 1221 122

Monday, March 26, 2018

अपनी ही ख़ता पर हो परिशां,जो दिल पे लगा कर रोते हैं

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अपनी ही ख़ता पर हो परिशां,जो दिल पे लगा कर रोते हैं,
वो लोग इमां के सच्चे हैं.............पर चैन से यारो सोते हैं ।

होता है फिदा दिल उनका भी,..धनवान वो मन के होते हैं,
होती है अदाएँ अल्लड़ सी.........दिल भंवरों से ही होते हैं ।

अब घुट ही न जाये दम उनका इन ग़ैर सी दिखती राहों में,
जो कीमती लम्हों को अपने.....फुटपाथ पे सोकर खोते हैं ।

अब छोड़ के कैसे जाएं वो कुछ कीमती रिश्तों की खातिर
जो रोज़ बिताते सड़कों पर.....खुशियों के पल जो बोते हैं ।

बर्बाद किये गुलशन इनके....कुछ वक़्ती गुनाहों ने लेकिन
जब पर्दा उठता कर्मों का......फिर अश्क़  बहाकर धोते हैं ।

हर्ष महाजन 

221 1222 22 221 1222 22