Tuesday, July 21, 2015

जब कासिदों के संग दिखेगा अपना दीवाना

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कलयुग में खूब बिकेगा वो ईमान ही होगा,
इंसान का दुश्मन......यहाँ इंसान ही होगा |

दलदल बनेंगे रिश्ते....हर पोशाक पर पैबंद,
दिल खुद का देखें हम तो बेईमान ही होगा |

जब कासिदों के संग दिखेगा अपना दीवाना,
दुश्मन यहाँ दुश्मन का...कदरदान ही होगा |

आतंकियों की देश में अब जात नहीं होती,
अब दोस्तों मत कहना मुसलमान ही होगा |

बुजदिल करेंगे राज़.......राजदार नहीं होंगे.
नफरत यहाँ पर हर तरफ तूफ़ान ही होगा |

हर्ष महाजन

Thursday, July 16, 2015

किस तरह आता मुझे तेरा नशा पूछोगे

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इन हवाओं से कभी.....मेरा पता पूछोगे,
किस तरह आता मुझे तेरा नशा पूछोगे |

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तूने जो ली थी कसम मुझसे जुदा होने पर,
मेरी धड़कन की सदाओं से सजा पूछोगे |

अब तलक मैंने जलाईं थीं हजारों ही शमा,
यूँ अंधेरों में बता किस से पता पूछोगे |

बेरहम यादें चलीं आहों में आंधी की तरह,
है असर इतना कि कण-कण से खुदा पूछोगे |

जब से रातों में दिखे रूहें जुगनुओं की तरह,
था कहाँ मैंने जलाया था दीया पूछोगे |

_____________हर्ष महाजन

मेरा वादा है तुझे दिल से जुदा कर दूंगा

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मन के साए से तुझे खुद ही रिहा कर दूंगा,
मेरा वादा है तुझे दिल से जुदा कर दूंगा |


कैसे चाहत का तेरी दिल से कतल कर दूं मैं  
तूने चाहा तो अगर ये भी खता कर दूंगा |

मेरी आँखों से तू टपकेगा कभी बन के दर्द,

मुस्करा के तेरी खुशियों को हवा कर दूंगा |

सरहदों पर है अगर दिल के अँधेरा भी बहुत,

दिल में आतिश सी जलाकर मैं दिया कर दूंगा |
 
यूँ तो हर शख्स का है अपना मुक़द्दर लेकिन,

रिश्ता गर तुझसे जुड़ेगा मैं रिहा कर दूंगा |

हर्ष महाजन

(रमल मुसम्मन मखबून मह्जुफ़ मकतू )
2122-1122-1122-22

साज़-ए-दिल बजते रहे महफ़िल-ए-गम चलती रही

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मुझको इस शहर में…ऐसे भी नज़ारे थे मिले,
दिन में कातिल कभी रातों को सहारे थे मिले |

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वो थे क्या दिन सभी इल्जाम जो खुद सर थे लिए,
फर्क इतना सा था बस तुझ से इशारे थे मिले |


जाने कैसा था भँवर दुनियाँ का हम खो से गए,
ये तो किस्मत थी कि दोनों को किनारे थे मिले |


साज़-ए-दिल बजते रहे महफ़िल-ए-ग़म चलती रही,
सारी गज़लों में थे पल संग गुजारे थे मिले |


जब भी तन्हाई में वो.....बन के सहारा थे मिले,|
ज़िन्दगी को यूँ समझ दिन वो उधारे थे मिले ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'

Friday, June 12, 2015

*वो शख्स इस तरह मुझे बदनाम कर गया



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वो शख्स इस तरह मुझे बदनाम कर गया,
दिल में छुपे वो राज़ सर-ए-आम कर गया ।

दिलचस्प बात ये कि उसे इल्म ही नहीं,
नादानियों में हवस मिरे नाम  कर गया ।

रुक्सत हुआ तो दिल में लिए बोझ था बहुत,
वो जाते-जाते दोस्ती नीलाम कर गया ।

नफरत नहीं मुझे मगर आँखों मेंहै नमी,
वो शख्स इस तरह मुझे बे-दाम कर गया ।

रुतबे पे अपने मुझको था क्या-क्या गुमाँ मगर,
इक पल में सारे शहर में तमाम कर गया

हर्ष महाजन

221 2121 1221 212

*एक तरही गजल दिए गये मिसरे पर

Monday, June 1, 2015

मुझसे रुठोगे अगर तुम तो किधर मैं जाऊंगा





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मुझसे रुठोगे अगर तुम तो किधर मैं जाऊँगा,
मैं हूँ आईना जो टूटा तो बिखर मैं जाऊँगा |

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कुछ ख़लिश होगी तुझे ये राह बदलेगा अगर,
दिल में चाहत तो रहेगी अब जिधर मैं जाऊँगा |
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लोग कहते हैं नशा ग़म को भुला देता अबस,
जो भी मयख़ाना मिलेगा फिर उधर मैं जाऊँगा |

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रौशनी देकर शमा ख़ुद को जला देती मगर ,
यूँ वफ़ा सबसे निभाओ तो सिहर मैं जाऊँगा |

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मैंने वादा था किया तुमसे दिलो जाँ बनके यूँ,
तुम भी दे दो गर जिगर अपना निथर मैं जाऊँगा |



हर्ष महाजन 'हर्ष'



2122 2122 2122 22

Friday, May 29, 2015

उसको लफ्ज़ ए मुहब्बत सिखाता रहा



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उसको लफ्ज़ ए मुहब्बत सिखाता रहा,
नज़्म वो लिखती ..धुन मैं बनाता रहा ।

उसकी तहरीरें दिल को..थीं चुबती रहीं,
मिसरा दर मिसरा मुझको रुलाता रहा ।

हम मुहब्बत में शायद.. रहे कम असर,
फिर भी दिल मैं.....उसी पे लुटात़ा रहा ।

मैंने सदियों कही....गम पे ग़ज़लें बहुत,
पर मैं नज्में उसी की........सुनाता रहा ।

रूठ कर जब वो दिल से हुई बे-दखल ,
जाने अफ़साने....जग क्या बनाता रहा ।

उम्र भर मैकदा से.............रहा दूर दूर,
अब मैं बज्मों में पीता..... पिलाता रहा ।

हर्ष महाजन

212-212-212-212