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Sunday, April 10, 2016

हुआ था खुश्क कभी दर्द-ए-ज़ख्म आज भी है

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हुआ था खुश्क कभी दर्द-ए-ज़ख्म आज भी है,
दीदा-ए-तर है मगर दिल तो नर्म आज भी है |

हुआ जो फुर्कत में साज़-ए-दिल शराब बनी,
नशा था तुझसे हुआ मुझमें मर्ज़ आज भी है |

लिखूंगा तुझपे ग़ज़ल अब तलक है याद मुझे,
बिखर गया दो-जहाँ तेरा क़र्ज़ आज भी है |

तलाशता हूँ अमल, कागजों पे हर्फ़ करूँ ,
किया जो मैंने कभी उसकी शर्म आज भी है | 

जलूँगा तुझपे अलख बन दिया मज़ार पे अब,
कि तुझको याद रहे मुझको गर्ज़ आज भी है |


__________हर्ष महाजन



बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
1212 1122 1212 112
दीदा-ए-तर = भीगी आँख
फुर्कत = अलगाव separation