Sunday, March 1, 2026

तिरी एक ही नज़र से मेरा दिल मचल न जाये

 

◆◆


तिरी एक ही नज़र से मेरा दिल मचल न जाये,
कि पिघल के मोम जैसा ये वजूद ढल न जाये ।

मिरी आँख का सितारा तिरी राह देखता है,
कोई अश्क बन के पलकों से यूँ ही फिसल न जाये।

तिरी याद का चराग़ाँ मिरी रूह में सजा है,
जो थिरक रही है लौ ये कहीं बुझ के जल न जाये।

अभी मुस्कुरा के देखो, अभी दिल को थाम लो तुम,
ये हसीं जो ख़्वाब देखा कहीं अब बदल न जाये।

मिरे ज़ब्त का सफ़ीना, किसी मौज की है ज़द में,
कहीं तेज़ धड़कनों से मेरा जी बहल न जाये।

तिरी सुर्ख़ शोख़ नज़रों का असर है आग जैसा,
कहीं आरज़ू का पंछी अभी पर निकल न जाये।

ये जो इश्क़ की तपिश है, ये जो हिज्र की अगन है,
इसे 'हर्ष' और हवा दो कि ये आग जलजाये


◆◆◆



➖➖➖➖➖➖
रमल मुसम्मन मशकूल
1121 2122 1121 2122

👉तर्ज़-
मैं तुम्हीं से पूछती हूँ, मुझे तुमसे प्यार क्यों है

इन आँखों की हँसी ने भी अजब बदलाव देखा है

 

■■
इन आँखों की हँसी ने भी अजब बदलाव देखा है,
मगर दुनिया की नज़रों में वही ठहराव देखा है।

महकती थी जहाँ खुशबू मुहब्बत की फ़ज़ाओं में,
वहाँ अब नफ़रतों का हमने इक फैलाव देखा है।

मिले जो अजनबी बनकर उन्हीं से रब्त गहरा था,
मगर अपनों के लहज़े में नया बर्ताव देखा है।

छलकते थे जो आँखों से वफ़ा के अश्क बनकर अब,
उन्हीं आँखों ने रिश्तों में नया दूराव देखा है।

समझ ऐ 'हर्ष' अब नादाँ ज़माने की जफ़ाओं को,
कि इस संसार में हर सम्त ही बिखराव देखा है।
■■■

➖➖➖➖➖➖
हज़ज मुसम्मन सालिम
1222 1222 1222 1222