Sunday, March 1, 2026

तिरी एक ही नज़र से मेरा दिल मचल न जाये

 

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तिरी एक ही नज़र से मेरा दिल मचल न जाये,
कि पिघल के मोम जैसा ये वजूद ढल न जाये ।

मिरी आँख का सितारा तिरी राह देखता है,
कोई अश्क बन के पलकों से यूँ ही फिसल न जाये।

तिरी याद का चराग़ाँ मिरी रूह में सजा है,
जो थिरक रही है लौ ये कहीं बुझ के जल न जाये।

अभी मुस्कुरा के देखो, अभी दिल को थाम लो तुम,
ये हसीं जो ख़्वाब देखा कहीं अब बदल न जाये।

मिरे ज़ब्त का सफ़ीना, किसी मौज की है ज़द में,
कहीं तेज़ धड़कनों से मेरा जी बहल न जाये।

तिरी सुर्ख़ शोख़ नज़रों का असर है आग जैसा,
कहीं आरज़ू का पंछी अभी पर निकल न जाये।

ये जो इश्क़ की तपिश है, ये जो हिज्र की अगन है,
इसे 'हर्ष' और हवा दो कि ये आग जलजाये


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रमल मुसम्मन मशकूल
1121 2122 1121 2122

👉तर्ज़-
मैं तुम्हीं से पूछती हूँ, मुझे तुमसे प्यार क्यों है

इन आँखों की हँसी ने भी अजब बदलाव देखा है

 

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इन आँखों की हँसी ने भी अजब बदलाव देखा है,
मगर दुनिया की नज़रों में वही ठहराव देखा है।

महकती थी जहाँ खुशबू मुहब्बत की फ़ज़ाओं में,
वहाँ अब नफ़रतों का हमने इक फैलाव देखा है।

मिले जो अजनबी बनकर उन्हीं से रब्त गहरा था,
मगर अपनों के लहज़े में नया बर्ताव देखा है।

छलकते थे जो आँखों से वफ़ा के अश्क बनकर अब,
उन्हीं आँखों ने रिश्तों में नया दूराव देखा है।

समझ ऐ 'हर्ष' अब नादाँ ज़माने की जफ़ाओं को,
कि इस संसार में हर सम्त ही बिखराव देखा है।
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हज़ज मुसम्मन सालिम
1222 1222 1222 1222


Friday, February 27, 2026

रात भर तेरे गम में चाक रहे

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रात भर तेरे गम में चाक रहे,

आँख भर-भर के जाम चलते रहे,


इक झलक पाने को तेरी अब तो,

यूँ ही चढ़-चढ़ के दाम चलते रहे |


क्यूँ ये रातें हैं अब अंधेरों सी,

चाँद छुप-छुप के क्यूँ निकलता है,


जिस तरह जल रहा था परवाना,

मेरे दिल से सलाम चलते रहे |


खौफ अब क्यूँ नजर नहीं आता,

इश्क जब गैरों में मचलने लगे,


दर्द उठ-उठ सकूं यूँ देता रहा,

जब तक उनके पयाम चलते रहे |


चाँद की चाहतों में दीवाना,

उम्र भर भटके बादलों की तरह ,


इश्क महफूज़ मैयतों में सदा,

जब वफाओं के जाम चलते रहे |


जब से उलझी हैं इश्क की राहें,

तुझको सजदे में हम पुकारा किये,


और पतझड़ में गिरते पत्तों पर,

तेरा लिख-लिख के नाम चलते रहे |


यूँ तो ये शहर बद-नसीबों का,

गम में भी करते शायरों से गिला,


है मगर ‘हर्ष’ बे-ख़बर शायर ,

फिर भी उनके कलाम चलते रहे |

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ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़

2122 1212 112

यूँ ही तुम मुझसे बात करती हो

तर्ज़--

Thursday, February 26, 2026

दिलों को जीत लेती हैं तुम्हारी ये वफ़ाएं हैं,

  

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दिलों को जीत लेती हैं तुम्हारी जो वफ़ाएं हैं,
मगर दुनिया के हाथों में पुरानी ही जफ़ाएं हैं

दुआओं में असर की अब तलाशें अपनी इल्तिजाएं हैं,
झुकी सजदे में देखो मुल्तज़ी सबकी जबाएं हैं

खुलें जो लब तो बस ज़िक्र-ए-मोहब्बत आम हो जाए,
फ़ज़ाओं में तो फिर गूँजे वही दिल की सदाएं हैं

पूछो मंज़िलों का हाल इन आवारा पैरों से,
मुसाफ़िर के मुक़द्दर में लिखी ऐसी सज़ाएं हैं

ख़ुदा जाने कहाँ लेकर चलेंगी ये हवाएं अब,
उमड़ कररही बादल की ये कैसी घटाएं हैं

सितम सहकर भी 'शायर' मुस्कुराता ही रहा हरदम,
यही तो ज़िंदगी की खूबसूरत ये अदाएं हैं

खिज़ां का खौफ़ क्या होगा जिसे मंज़िलमिल पाई,
लहू से सींच दी हमने चमन की सब कथाएं हैं

दुआ में हाथ जो उठता है तो महसूस होता ,
मिरे हक में ज़माने की बदलती अब दुआएं हैं

ज़माने भर को भाती हैं मेरी पागल सी ये बातें,
सितम सह कर भी लब पर 'हर्ष' के रहतीं सदाएं हैं

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हज़ज मुसम्मन सालिम
1222 1222 1222 1222


Tuesday, February 24, 2026

कोई मय मिली न ही हम-सफर

 

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कोई मय मिली न ही हम-सफर,
कोई मैकदा भी मिला नहीं,
जो फ़ज़ा में घोल पिलायेगा,
कोई ऐसी दिल की दवा नहीं ।

वो तो ख्वाब था जो धुआँ हुआ,
जो मिला भी था वो फ़ना हुआ,
ये अजब सज़ा थी नसीब में,
कोई रास्ता भी दिखा नहीं ।

ये मुसाफिरों के हजूम में,
यहां कौन कितना अमीर है,
जो बुझा सके मेरी तिश्नगी,
कोई ऐसा भी तो मिला नहीं ।

कोई आके मझको करीब से,
सर-ए-राह मिल के बताएगा ?
ये जो बे-वफ़ा था मिला मुझे,
हुआ 'हर्ष' से क्यूँ ज़ुदा नहीं ।
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Kaamil murabba saalim
11212 11212

"न किसी की आँख का नूर हूँ"

Friday, February 20, 2026

ढलने लगी ये सांझ तो मुझको भुला दिया

 

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ढलने लगी ये सांझ तो मुझको भुला दिया,
इक ज़िंदगी ने ज़िंदगी को ही रुला दिया ।

वो जब मिले तो यूँ मिले इक ख्वाब की तरह,
दिल के मचलते प्यार में तूफाँ जगा दिया ।

लेकिन तू मुझको ये बता, मुझसे था क्या गिला,
इन साजिशों के शोलों में, दिल तक जला दिया ।

बदली की भाँति आये, बरस कर यूँ चल दिये,
मेरी हसीन चाह को, झटका लगा दिया ।

बे-वक़्त काली रात में, डूबे हैं इस तरह
ज्यूँ रोशनी को 'हर्ष' ने खुद ही दगा दिया

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मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
221 2121 1221 212


दिन भी हुआ धुआँ-धुआँ

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दिन भी हुआ धुआँ-धुआँ, रातें हुईं उदास,
अब आदमी के बीच हुआ आदमी खलास।

रहबर ही जब न मुल्क में छोड़ें कोई कसर,
पहने हुए हैं जिस्म पे सब काग़ज़ी लिबास।

फूँका किए हैं दूसरों के घर जो अब तलक,
अब अपने ही मकाँ का नहीं होता है अभास।

वादों का क्या कि काँच हैं, बस एक ठेस से,
टूटेंगे इस तरह से कि होगा नहीं उजास।

शिकवों के डर से आज भी मिलते नहीं हैं लोग,
इस शहर-ए-बे-हिसी में भला 'हर्ष' किसकी आस।
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शहर-ए-बे-हिसी=भावनाओं से रहित शहर