Thursday, October 8, 2015

बजता हूँ बन के साज तेरे मंदिरों में अब

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बजता हूँ बन के साज तेरे मंदिरों में अब,
देता तुझे आवाज तेरे मंदिरों में अब |
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मांगी थी मैंने उम्र की संजीदगी लेकिन,
क्यों इस तरह मुहताज तेरे मंदिरों में अब |
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मन जिसका देखूं दुश्मनी की नीव पे काबिज़,
कैसे करूँ परवाज़ तेरे मंदिरों में अब |
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बस रौशनी की खोज में भटका तमाम उम्र
पगला गया, नेवाज तेरे मंदिरों में अब |
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ले चल मुझे शमशान, कोई गम जहाँ ना हो,
मेरा गया हमराज, तेरे मंदिरों में अब |
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हर्ष महाजन ©

Wednesday, October 7, 2015

खिजाँ आयी है किस्मत में बहारों का भी दम निकले

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खिजाँ आयी है किस्मत में बहारों का भी दम निकले,
जहाँ ढूँढू मैं अरमां को , वहां अरमां भी कम निकले |

हजारों गम मेरे दिल में न मुझको राख ये कर दें ,
कहीं इन सुर्ख आँखों से नदी बन के न हम निकले |


तुम्हें लिख-लिख के ख़त अक्सर कभी मैं भूल जाता था,
पुराने ख़त दराजों से जो निकले आज, नम निकले |


किसी की जुस्तजू करके कि खुद को खो चुका हूँ मैं,
उधर से बेरुखी उनकी इधर दुनिया से हम निकले |


जगह छोड़ी है जख्मों ने कहाँ अब 'हर्ष' सीने में,
कहीं इन सुर्ख ज़ख्मों से न लावा बनके गम निकले |


हर्ष महाजन

Monday, October 5, 2015

अपनी साँसे भी मुझे अपनी सी लगती ही नहीं

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अपनी साँसे भी मुझे अपनी सी लगती ही नहीं,
बात इतनी सी मगर दिल से ये निकली ही नहीं |

दिल में आतिश है बहुत ये हुस्न बे जलवा नहीं
चाहता हूँ आग उसमें पर वो जलती ही नहीं |

शाम से शब ग़ैर की ज़ुल्फ़ों में जब करने लगे
रात ऐसी जो हुई फिर सुब्ह निकली ही नहीं |

जब तलक थे हमकदम, अपना सफ़र चलता रहा,
दरिया क़तरा जब हुवा, मंज़िल वो मिलती ही नहीं |

इस कदर रोया हूँ मैं आखें भी धुंधला सी गई,
आज कुछ बूँदे भी आँखों से निकलती ही नहीं |

हर्ष महाजन

Tuesday, July 21, 2015

जब कासिदों के संग दिखेगा अपना दीवाना

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कलयुग में खूब बिकेगा वो ईमान ही होगा,
इंसान का दुश्मन......यहाँ इंसान ही होगा |

दलदल बनेंगे रिश्ते....हर पोशाक पर पैबंद,
दिल खुद का देखें हम तो बेईमान ही होगा |

जब कासिदों के संग दिखेगा अपना दीवाना,
दुश्मन यहाँ दुश्मन का...कदरदान ही होगा |

आतंकियों की देश में अब जात नहीं होती,
अब दोस्तों मत कहना मुसलमान ही होगा |

बुजदिल करेंगे राज़.......राजदार नहीं होंगे.
नफरत यहाँ पर हर तरफ तूफ़ान ही होगा |

हर्ष महाजन

Thursday, July 16, 2015

किस तरह आता मुझे तेरा नशा पूछोगे

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इन हवाओं से कभी.....मेरा पता पूछोगे,
किस तरह आता मुझे तेरा नशा पूछोगे |

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तूने जो ली थी कसम मुझसे जुदा होने पर,
मेरी धड़कन की सदाओं से सजा पूछोगे |

अब तलक मैंने जलाईं थीं हजारों ही शमा,
यूँ अंधेरों में बता किस से पता पूछोगे |

बेरहम यादें चलीं आहों में आंधी की तरह,
है असर इतना कि कण-कण से खुदा पूछोगे |

जब से रातों में दिखे रूहें जुगनुओं की तरह,
था कहाँ मैंने जलाया था दीया पूछोगे |

_____________हर्ष महाजन

मेरा वादा है तुझे दिल से जुदा कर दूंगा

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मन के साए से तुझे खुद ही रिहा कर दूंगा,
मेरा वादा है तुझे दिल से जुदा कर दूंगा |


कैसे चाहत का तेरी दिल से कतल कर दूं मैं  
तूने चाहा तो अगर ये भी खता कर दूंगा |

मेरी आँखों से तू टपकेगा कभी बन के दर्द,

मुस्करा के तेरी खुशियों को हवा कर दूंगा |

सरहदों पर है अगर दिल के अँधेरा भी बहुत,

दिल में आतिश सी जलाकर मैं दिया कर दूंगा |
 
यूँ तो हर शख्स का है अपना मुक़द्दर लेकिन,

रिश्ता गर तुझसे जुड़ेगा मैं रिहा कर दूंगा |

हर्ष महाजन

(रमल मुसम्मन मखबून मह्जुफ़ मकतू )
2122-1122-1122-22

साज़-ए-दिल बजते रहे महफ़िल-ए-गम चलती रही

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मुझको इस शहर में…ऐसे भी नज़ारे थे मिले,
दिन में कातिल कभी रातों को सहारे थे मिले |

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वो थे क्या दिन सभी इल्जाम जो खुद सर थे लिए,
फर्क इतना सा था बस तुझ से इशारे थे मिले |


जाने कैसा था भँवर दुनियाँ का हम खो से गए,
ये तो किस्मत थी कि दोनों को किनारे थे मिले |


साज़-ए-दिल बजते रहे महफ़िल-ए-ग़म चलती रही,
सारी गज़लों में थे पल संग गुजारे थे मिले |


जब भी तन्हाई में वो.....बन के सहारा थे मिले,|
ज़िन्दगी को यूँ समझ दिन वो उधारे थे मिले ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'