Friday, March 4, 2016

तेरे हिस्से की मैंने दिल में इक सौगात रक्खी है



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तेरे हिस्से की मैंने दिल में इक सौगात रक्खी है,
ज़रा आओ तो परदे में.......ज़मीं आज़ाद रक्खी है |

तेरे कूचे की मुझको......यादें क्यूँ जीने नहीं देतीं,
नज़र भर देख आँखों में वो शय आबाद रक्खी है |


मुहब्बत की हवेली ये.......इसे बीरान न कर तू ,
ये अपनी रूह भी, खातिर तेरे, बेज़ार रक्खी है |


अगर मुमकिन नहीं आना भुलाना भी नहीं वाजिब,
लबों से हंस के मैंने...जान भी कुर्बान रक्खी है |


इलाही सब्र का दामन.......कभी छोड़ा नहीं मैंने,
तेरी तस्वीर दिल में उस जगह बेदाग़ रक्खी है |


कभी आँखों से बहते अश्क भी भूला नहीं हूँ मैं,
खुदाया आना तू इक बार इक रुदाद रक्खी है | 


______हर्ष महाजन


1222 1222 1222 1222

जो दो दिल साथ रहते हैं मुहब्बत साथ चलती है

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जो दो दिल साथ रहते हैं मुहब्बत साथ चलती है,
वो रिश्ता तब संभलता हैं कि जब बारात चलती है |
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चलो इंसानियत की सब हदें हम पार भी कर लें,
ये धोखा यार को दें पर खुदा की मार चलती है |
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जो किस्मत में मुहब्बत है मचलना भी ज़रूरी है,
वो मचले गैर पर फिर दिल पे इक तलवार चलती है |
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यूँ आँखों से किसी का दिल में नीचे तक उतर जाना,
तो जीने मरने में दिल की न जीत-औ-हार चलती है |
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ज़मीने-हुस्न पर सदियों से तलवारें चलीं लेकिन,
मुहब्बत हीर-रांझे सी तो बारम्बार चलती है |
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हर्ष महाजन

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1222 1222 1222 1222

Wednesday, March 2, 2016

ये सदन अब ऎसी दुकां हुआ

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ये सदन अब ऎसी दुकां हुआ,
काफिरों का जमघट जहां हुआ |

है सियासी दाव न शर्म कोई,
सरफिरों का लगता मकां हुआ |


अब ज़बीं पे जिसके न दाग हो,
ये सदन अब कैसा जवां हुआ |


क्यूँ घुला है सांसदों में ज़हर,
जबकि वोटों से इम्तिहां हुआ | 


क्यूँ फलक ज़मी पे झुका दिया,
की ग़ज़ल में हिन्दोस्तां हुआ |


ये नतीजा अब.....बैर का नहीं,
देख क्या किसके दरमियाँ हुआ |


जो वतन से गर इश्क मर गया,
तो समझना गर्दिश समां हुआ |


सांसदों के हाथों....कमान देख,
हर बशर भी अब परीशां हुआ |


____हर्ष महाजन


बशर=आदमी
2122 2212 12

Monday, February 22, 2016

तेरे सिजदे में बाबा सर झुका कर मैं भी देखूंगा

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तेरे सिजदे में बाबा सर झुका कर मैं भी देखूंगा,
तले पांवों के होंमें खुद दबा कर मैं भी देखूंगा ।

तेरे इस नूर की चादर से दाता दूर मैं क्यूँ हूँ,
उठा दे पर्दा पापी का, दया कर मैं भी देखूंगा ।

मैं कामी क्रोधी लोभी और दाता तू है बक्शनहार,
तेरे दर्शन को अब सचखंड में आकर मैं भी देखूंगा ।

अनंत रूहों को तूने उनके पापों से उभारा है,
रूहानी मंडलों में तेरे जाकर मैं भी देखूंगा ।

मैं अपने ही अहम् का बरसों से मारा हुआ लेकिन,
हुई रहमत तेरी, दुंनियां भुलाकर मैं भी देखूंगा ।

-----------------------हर्ष महाजन

Friday, January 8, 2016

तेरी नज़रों से जो उतरूँ क्यूँ न मर जाऊं अभी

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तेरी नज़रों से जो उतरूँ क्यूँ न मर जाऊं अभी,
ज़िंदगी को यूँ ही रौशान क्यूँ न कर जाऊं अभी |
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ख्वाब बनकर मेरी आँखों में, समा जाए अगर,
ये नसीहत ही सही खुद....मैं सुधर जाऊं अभी |
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ये तमन्ना थी कि मुझको भी रिझाये तू कभी,
गर ये मुमकिन हो समंदर में उतर जाऊं अभी |
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बेवफा दुनिया कहे मुझको...तो परवाह है किसे,
बेवफा तू जो कहे तो.......न बिखर जाऊं अभी |
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ज़ुल्म इतने सहे दुश्मन की, निगाहों से सदा,
तू भी नफरत जो करेगी तो किधर जाऊं अभी |

हर्ष महाजन

तर्ज़ : “रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ”

Thursday, January 7, 2016

जाने अखियों से छलकते अश्क क्यूँ उस याद में

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जाने अखियों से छलकते अश्क क्यूँ उस याद में,
जिसने तडपाया मुझे जलती हुई इक आग में |

इतना गम बन आह निकले आज फिर इस ज़हन से,
दिल धड़कता भी रहेगा आस रख फ़रियाद में |

जिस्म से ज्यूँ रूह निकले होता क्या पूछो मुझे,
आरज़ू उसके मिलन की रह गई जब खवाब में |

ज़ुल्फ़ दिल पे यूँ थी काबिज़ भूल कर भूला नहीं,
चल रहा अब तक नशा देखा कभी न शराब में |

जिन हवाओं में कयामत अब तलक देखी न थी,
रूह को छू कर निकलती बन अदा वो शबाब में |

हर्ष महाजन

2122 2122 2122 212

Monday, November 16, 2015

चाहा जिसे था दिल के बंद दरवाजे ही मिले

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चाहा जिसे था दिल के बंद दरवाजे ही मिले ,
वो दोस्ती में मुझको बस अजमाते ही मिले |
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ज़ब्रो ज़फ़ा गरीबों पर जिस-जिस ने की अगर,
हर जुर्म खुद खुदा को वो लिखवाते ही मिले |

बदनाम वो शहर में पर, काबे का था मरीज़,
हर चोट भी ख़ुशी से सब बतियाते ही मिले |

वो यार था अजीजों सा, दुश्मन भी था मगर,
हर राज-ए-दिल उसे पर हम बतलाते ही मिले |

इस दौर में जिधर भी देखो गम ही गम हुए,
ऐ ‘हर्ष’ ज़िन्दगी में वो भी आधे ही मिले |

________हर्ष महाजन

ज़ब्रो ज़फ़ा = ज़बरदस्ती और अन्याय...
क़ाबे - House Of Allah In Mecca

बहर - r 2212 1222 2222 12