Friday, May 21, 2021

हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो

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हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो,

अपने साहिल को भी तुम अपना बताना छोड़ दो ।


अर्थियों के संग भी अपना कोई दिखता नहीं,

आज से अपनों पे अपना हक जताना छोड़ दो ।


जब तलक दस्तक न दे वो दर्द तेरे द्वार पे,

ज़िन्दगी की खुशियों को यूँ ही गँवाना छोड़ दो ।


अस्पतालों से निकलती लाशों को देखो ज़रा,

कह रहीं हैं अपनों से नफ़रत बढ़ाना छोड़ दो ।


ज़िन्दगी में ऐसा मंज़र आएगा सोचा न था,

आदमी से 'हर्ष' अब मिलना मिलाना छोड़ दो ।


-------हर्ष महाजन 'हर्ष'

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Sunday, May 16, 2021

ये कैसा वार मेरे यार करके छोड़ दिया

 ये कैसा वार मेरे यार करके छोड़ दिया,

मेरा नसीब क्यूँ बीमार करके छोड़ दिया ।


अभी-अभी तो गुलों में बहार होने को थी,

हवा को किसने गिरफ़्तार करके छोड़ दिया ।


ढली है शाम-ओ-सहर औऱ उम्र भी पल में,

हुए ज़ुदा तो गुनाहगार करके छोड़ दिया ।


वो बेवफ़ा भी कहें मुझको ये कबूल सही,

मगर है रंज मुझे प्यार करके छोड़ दिया ।


ज़ुदा हुए तो हुए इसका तो है ग़म लेकिन,

है ग़म तो उसका कि गुल **खार करके छोड़ दिया ।


लगी क्या आँख जरा सी वफ़ा भी भूल गए,

मेरा वज़ूद यूँ मझधार करके छोड़ दिया ।


ज़मी भी थम सी गयी आसमाँ ठहर सा गया,

यूँ मेरी हस्ती को बेकार करके छोड़ दिया ।


जो कद्र करता रहा उम्र भर तेरी लेकिन,

उसी चराग़ को बेज़ार करके छोड़ दिया ।


तवाफ़* करता रहूँ तेरे इर्द गिर्द लेकिन,

ये आस पास क्यूँ दीवार करके छोड़ दिया ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

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Friday, May 7, 2021

अपनी कोई भी पुरानी चीज़ उठाकर देखिये


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अपनी कोई भी पुरानी चीज़ उठाकर देखिये,

लुत्फ कितना आएगा बस आज़माकर देखिये ।


ज़िन्दगी में रंग कितने यूँ समझ में आएगा,

कोई भी नग्मा पुराना ख़ुद ही गाकर देखिये ।


मिल सकेगा तुमको भी लाखों दिलों का प्यार यूँ ,

बस किसी के जख्मों को मरहम लगाकर देखिये ।


कैसे अश्क़ों से भरा है आजकल हर आदमी,

हो सके काँधे पे उसका सर टिकाकर देखिये ।


हँसते हैं जो लोग किसी की मौत पर यूँ ही अबस,

कह दो कोई सपनों में अपना गँवाकर देखिये ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'

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★★आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे★★

Wednesday, November 11, 2020

यार जब लौट के दर पे मेरे आया होगा,

 

ग़ज़ल



यार जब लौट के दर पे मेरे आया होगा,

आख़िरी ज़ोर मुहब्बत ने लगाया होगा ।


याद कर कर के वो तोड़ी हुई क़समें अपनी,

आज अश्कों के समंदर में नहाया होगा ।


ज़िक्र जब मेरी ज़फ़ाओं का किया होगा कहीं,

ख़ुद को उस भीड़ में तन्हा ही तो पाया होगा ।


दर्द अपनी ही अना का भी सहा होगा बहुत,

फिर से जब दिल में नया बीज लगाया होगा ।


जब दिया आस का बुझने लगा होगा उसने,

फिर हवाओं को दुआओं से मनाया होगा ।


----हर्ष महाजन 'हर्ष'

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होके मज़बूर मुझे उसने भुलाया होगा ।

मुहब्बत की जब इंतिहा कीजियेगा,

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मुहब्बत की जब इंतिहा कीजियेगा,

निगाहों से तुम भी नशा कीजियेगा ।


सफ़र दिल से दिल तक लगे जब भी मुश्किल ,

दुआओं की फिर तुम दवा कीजियेगा ।


नज़र ज़ुल्फ़ों पे गर टिकें ग़ैरों की तो,

यूँ आँखों में नफ़रत अदा कीजियेगा ।


मुझे सोच, हों चश्म, नम तो समझना,

ये जज़्बात अपने अता कीजियेगा ।


ये है इल्तिज़ा मर भी जाऊँ तो इतनी,

ख़ुदा से न तुम ये गिला कीजियेगा ।


मेरी आरज़ू , बंदगी तुम समझ कर,

अदा फिर उम्मीद-ए-वफ़ा कीजियेगा ।


निगाहों में मेरी फ़क़त तुम ही मंज़िल,

मुक़द्दर की अब इब्तिदा कीजियेगा ।


■


हर्ष महाजन 'हर्ष'

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अज़ी रूठ कर तुम कहाँ जाइयेगा

मुझको हरसूं नशा सा रहता है


...

मुझको हरसूं नशा सा रहता है,

जैसे मुझमें खुदा सा रहता है ।


चाहतों का जो पूछो मुझसे कभी,

उनसे क्यूँ दिल जला सा रहता है ।


फिर भी रहता है ख़ौफ़ मुझमें क्यूँ ,

दिल भी ख़ुद से डरा सा रहता है ।


बोझ लगती हैं राहें भी अपनीं,

ज़ख्म गहरा हरा सा रहता है ।


जब भी नज़दीक होती मन्ज़िल तो,

दर्द भी फिर भला सा रहता है ।


----हर्ष महाजन 'हर्ष'

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Friday, September 11, 2020

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन,

 

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन,
पास दौलत है तो उसकी है ये दौलत दुश्मन ।

दोस्त इस दौर के दुश्मन से भी बदतर क्यूँ हैं,
देख होती है मुहब्बत की हकीकत दुश्मन ।

माँग लो जितनी ख़ुदा से भी ये ख़ुशियाँ लेकिन,
हँसते-हँसते भी हो जाती है ये जन्नत दुश्मन ।

मैं बदल सकता था हाथों की लकीरों को मगर,
यूँ न होती वो अगर मेरी मसर्रत दुश्मन ।

ऐसे इंसानों की बस्ती से रहो दूर जहॉं,
'हर्ष' हो जाए मुहब्बत की मुहब्बत दुश्मन ।

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