Friday, September 11, 2020

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन,

 

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन,
पास दौलत है तो उसकी है ये दौलत दुश्मन ।

दोस्त इस दौर के दुश्मन से भी बदतर क्यूँ हैं,
देख होती है मुहब्बत की हकीकत दुश्मन ।

माँग लो जितनी ख़ुदा से भी ये ख़ुशियाँ लेकिन,
हँसते-हँसते भी हो जाती है ये जन्नत दुश्मन ।

मैं बदल सकता था हाथों की लकीरों को मगर,
यूँ न होती वो अगर मेरी मसर्रत दुश्मन ।

ऐसे इंसानों की बस्ती से रहो दूर जहॉं,
'हर्ष' हो जाए मुहब्बत की मुहब्बत दुश्मन ।

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2122 1122 1122 22


Wednesday, August 26, 2020

जाम खाली सामने खलते रहे



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जाम खाली सामने खलते रहे,
ज़ख़्म दिल के दिल में ही पलते रहे l

नीदों से जब हो गए हम बेदखल,
साथ बीते दिन सभी खलते रहे ।

चाँद जब बदली से फिर-फिर झाँकता,
दिल में उठते कुछ भँवर छलते रहे ।

ज़िन्दगी वीरान जब होने लगी,
सपने फिर बन ख़ौफ़ सँग चलते रहे ।

इन लबों पर क्यूँ भला आती हँसी,
आफ़ताब-ए-इश्क़ में जलते रहे ।

-हर्ष महाजन 'हर्ष'

2122 2122 212
'दिल के अरमां आंसुओं में बह गए'

Friday, August 21, 2020

अपने जीते जी ये दवा कर ले

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अपने जीते जी ये दवा कर ले,
मौत से पहले ही दिया कर ले ।

बेवफा और दुनियाँ में कातिल,
कर दे कामिल तु या फनां कर ले ।

हम तो हैं वक़्त के सुनो पाबंद,
मेरे संग मिल के ये दुआ कर ले ।

मैं तो घबरा गया हूँ इस जग में,
या ख़ुदा मुझ्को आशना कर ले ।

दर्दे ग़म अपनों का सहूँ कितना,
आ ख़ुदा दुनियाँ से जुदा कर ले ।

जो तू चाहे दिवानगी से अगर,
प्यार की आ तू इंतिहा कर ले ।

धौंकिनी सी लगी चले दिल पर,
दिल से दिल आ के मुब्तिला कर ले ।

कोई पूछेगा मुझसे क्यूँ आखिर,
आके कोई भी मशविरा कर ले ।

चाँद तो पहले ही ख़फ़ा लेकिन,
कोई तो मुझसे फिर वफ़ा कर ले ।

मेरा मकसूद मेरी मंज़िल पर,
है तुझे ग़म तो आ गिला कर ले ।

है तू अब भी मुहब्बतों में अगर,
लग ज़िगर और हौंसला कर ले ।


-------हर्ष महाजन 'हर्ष'

2122 1212 22(112)
"मेरी किस्मत में तू नहीं शायद"

Tuesday, August 11, 2020

लगा दोस्तों को गँवारा नहीं था

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लगा  दोस्तों को  गँवारा नहीं था,
तभी महफ़िलों में पुकारा नहीं था ।

ज़ुदा तो हुए सब बहे अश्क़ इतने,
मग़र अश्क़ कोई हमारा नहीं था ।

ये चाहा करूँ बेदख़ल उनको ख़ुद से,
मग़र हमको दिल का इशारा नहीं था ।

बहुत मात लहरों को दी हमने लेकिन,
समंदर में कोई, किनारा नहीं था ।

लकीरों में हर पल थे ढूँढा किये हम,
अभी दिल से जिनको उतारा नहीं था ।

सफर तो दिलों का था मुश्किल नहीं पर,
अना में किसी ने पुकारा नहीं था ।

उठी इतनी नफ़रत अचानक दिलों में,
जुदाई बिना अब गुज़ारा नहीं था ।

हमें हमसफ़र अब मिले भी तो कैसे,
मुक़द्दर का कोई भी मारा नहीं था ।

---------हर्ष महाजन 'हर्ष'

122 122 122 122
"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ ।"

Wednesday, August 5, 2020

जो दुश्मन है कभी तुमको नहीं अपना कहा करते,

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जो दुश्मन है कभी तुमको नहीं अपना कहा करते,
ये कलयुग है यहॉं अपने नहीं अपने हुआ करते ।

कभी मैंने किसी का भी बुरा चाहा नहीं अब तक,
मगर किस्मत ने हाथों में लिखी ठोकर तो क्या करते ।

जिन्हें है ग़म कि दुनियाँ में क्युँ ऊपर है ख़ुदा उनसे,
हुआ मंज़र तबाही का ख़ुदा भी क्या वफ़ा करते ।

नहीं मैं बेख़बर अब रूबरू हूँ मौत से लेकिन,
यहाँ पर दोस्त दुश्मन से भी बदतर क्यूँ जफ़ा करते ।

ज़माने में हुआ करते है ऐसे भी ये मंज़र क्यों,
वफ़ा करके भी आंखों में समन्दर क्यों रहा करते ।

------हर्ष महाजन 'हर्ष'

1222 1222 1222 1222
"मुहब्बत हो गयी जिनको वो परवाने कहां जाएं"

Monday, August 3, 2020

गर मुहब्बत सहारा नहीं

सुफआना कलाम

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गर मुहब्बत सहारा नहीं,
दुश्मनी से गुज़ारा नहीं ।

पास अपने बुला लो हमें,
या तो कह दो तुम्हारा नहीं ।

दूरियाँ सह न पायेंगे हम,
तेरे बिन अब गुज़ारा नहीं ।

प्यार मिलता है तकदीर से,
फिर मिलेगा दुबारा नहीं ।

अपने मन पे है कैसा गरूर,
हो सका ये हमारा नहीं ।

'हर्ष' है तो ख़ुशी हर तरफ़,
दूर हुए गर ख़ुदारा नहीं ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'

ख़ुदारा= किसी चीज़ का छोटा सा अंश

बहर:
212 212 212 

*ज़िन्दगी प्यार का गीत है*

Wednesday, June 24, 2020

वो शख्स इस तरह मुझे बदनाम कर गया



Re-written Gazal
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वो शख्स इस तरह मुझे बदनाम कर गया,
दिल में छुपे वो राज़ सर-ए-आम कर गया ।

नफरत नहीं मगर जो कहा बेवफ़ा मुझे,
वो शख्स इस तरह मुझे बे-दाम कर गया ।

रुक्सत हुआ तो दिल में लिए बोझ था बहुत,
वो जाते-जाते दोस्ती नीलाम कर गया ।

रुतबे पे अपने मुझको था क्या-क्या गुमाँ मगर,
किस-किस अदा से शह्र में बदनाम कर गया ।

दिलचस्प बात ये कि मुझे इल्म ही नहीं,
अपने वो क़र्ज़ सारे मेरे नाम कर  गया ।

इतनी सी आरज़ू है कोई कह सके उसे,
है कौन जिसके वास्ते वीरान कर गया ।

चर्चा भी उसकी शह्र में इज़्ज़त भी बढ़ चली,
ऐसा लगा वो ख़ुद को सुलेमान कर गया ।

ऐ 'हर्ष' ऐसी दुनियाँ में कैसे जियेगा अब,
दिल में बसा जहान वो शमशान कर गया ।

ये ज़ुल्म ये हया ओ सज़ा उसने दी मुझे,
अब सोचता हूँ वो मुझे इंसान कर गया ।

----हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2121 1221 212
मिलती है ज़िन्दगी में मुहब्बत कभी कभी