Thursday, July 22, 2021

वो टिम-टिम सितारों को छिपना ही होगा

 ये रुख अब हवा का बदलने लगा है,

यूँ मौसम ये शोला उगलने लगा है ।


पता जब चला साजिशों का था हमको,

तो दिल कातिलों का दहलने लगा है ।


भला कब तलक क़ैद साँसे रहेंगी,

कवच वादियों का पिघलने लगा है ।


क्यूँ गुमराह होंगी दिशाएँ ये कब तक,

ये तेवर फ़लक का बदलने लगा है ।


हवाओं में फौलाद जैसा है जादू,

घटाओं का आलम छिटकने लगा है।


वो टिम-टिम सितारों को छिपना ही होगा,

अँधेरे में सूरज निकलने लगा है ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

बह्र:

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Saturday, July 17, 2021

इतना हुआ था बे-कदर ज़ख्मों को पी गया

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इतना हुआ बे-कदर इन ज़ख्मों को पी गया,

इक बे-वफ़ा सी ज़िंदगी अश्कों मे जी गया |


कुछ इस तरह है अब मेरी यादोँ का ये सफ़र,

कुछ रिस रहें हैं ज़ख़्म अब कुछ मैं ही सी गया ।


यूँ इस तरह से गर्दिशों में छोड़कर मुझे,

नज़रों में था जो शख्स मेरे दिल से भी गया ।


दुनियाँ में जो मैं जी रहा इज़्ज़त ओ शान से,

क्या गर्दिश-ए-दौरा चला फिर नाम ही गया ।


वो बे-वफ़ा या बे-हया था यार वो मेरा,

शिकवे ज़ुबाँ पे रंज-ओ-ग़म ख़ुद मैं ही पी गया ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

Tuesday, June 29, 2021

बेवफ़ा को अश्क़ों की क्यूँ हो ख़बर

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बेवफ़ा को अश्क़ों की क्यूँ हो ख़बर,

कर गया दिल को मेरे जो बे- ज़िगर ।


चाँद उतरा है ज़मी पर थी ख़बर,

अब नहीं होता कोई मुझको असर ।


इतना अर्सा था वो मेरा आशना,

पर अधूरा कर गया मेरा सफ़र ।


जिन लबों पर मुस्कराहट थी कभी,

अब नहीं करती ख़बर कोई असर ।


अश्क़ों से दामन है इतना भर गया,

अब नहीं चाहत कोई हो हमसफ़र ।


जिनको मुद्दत से कोई तरसा किये,

कह नहीं सकते हो कोई मोतबर ।


आशियाँ दिल में बनाने के लिए,

सह लिया मैं बेवफ़ाई का क़हर ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'

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"तुम न जाने किस जहॉं में खो गए"


मोतबर = भरोसेमंद

Tuesday, June 22, 2021

घर किसी के दिया इक, जला कर के देख़

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घर किसी के दिया इक, जला कर के देख़,

क्या मिलेगा सकूँ,     आज़मा कर के देख़ ।


सरहदों पर हैं बुझते,        चिरागों के घर,

जो हक़ीक़त है ख़ुद की बना कर के देख़ ।


देखनी है दिलों में,     ख़ुशी अपनों की,

मिट सकें रंजिशें तो, मिटा कर के देख़ ।


दुश्मनी भी है गर,   दिल धड़कते  मगर,

दिल मिले हों न हों, मुस्करा कर के देख़ ।


इक़ अना के लिए,      अजनबी हो गए,

पर ख़ुदा के लिए सर झुका कर के देख़,


कब ख़ुशी कब थे ग़म कब हुए चश्म नम,

यादें अपनी पुरानी,       उठा कर के देख़ ।


ज़िन्दगी के लिए,          वस्ल की चाह में 

अपने दिल में ख़ुदा को बिठा कर के देख़ ।


---हर्ष महाजन 'हर्ष'

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Monday, June 21, 2021

डैडी (पार्ट 2)


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जब से बिछुड़े हो, ठंडी हवा कौन दे,

 अब तो माँ भी नहीं है दवा कौन दे ।


ज़िन्दगी भर जो हमने खतायें हैं की,

अब तरसते हैं हमको सज़ा कौन दे ।


ज़ख़्म गहरे हैं राहत से अनजान हैं,

अब तुम्हारे सिवा ये भला कौन दे ।


शूल दिखते नहीं थे कभी तब हमें,

कुछ सुझाओ इन्हें अब हटा कौन दे ।


रोज़ ढूंढा किये हम सुनों कम से कम,

ये बता दो तुम्हारा पता कौन दे ।


जी रहे हैं तुम्हारे ही लफ़्ज़ों पे हम,

जीत पर अब हमारी दुआ कौन दे ।


कोई ऐसा मिले उनकी यादों में अब,

देखते हैं हमें, अब हरा कौन दे ।


------हर्ष महाजन 'हर्ष'

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"तुम अगर साथ देने का वादा करो"

Sunday, June 20, 2021

हो मुहब्बत ख़फ़ा तो वफ़ा कौन दे

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हो मुहब्बत ख़फ़ा तो वफ़ा कौन दे,

ज़ख़्म गहरा है पर अब दवा कौन दे ।


ख़्वाब तू था मेरा ज़िन्दगी भी मेरी,

इस हक़ीक़त का तूझको पता कौन दे ।


तेरी उल्फ़त को गर मैं निभा न सका,

मानता हूँ मैं पर अब सज़ा कौन दे ।


बेवफ़ा गर हूँ मैं तो सज़ा दे मुझे,

बद्दुआ देगा तू फिर दुआ कौन दे ।


दिल ये पत्थर नहीं बेवफ़ा भी नहीं,

पर ज़माने में इसको हवा कौन दे ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

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"तुम अगर साथ देने का वादा करो"

Wednesday, June 16, 2021

आपसी रिश्तों में इतना जाने क्यूँ अब ज़ह्र है

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आपसी रिश्तों में इतना जाने क्यूँ अब ज़ह्र है,

कुछ हुए क़ातिल ज़ुबाँ से कुछ में  थोड़ी खैर है ।


हमने डरते डरते कह दी इक ग़ज़ल अपनों में फिर,

देखते ही देखते हर शख़्स लगता  ग़ैर है ।


बड़ रही हर क़ौम में अब दुश्मनों की हलचलें,

कोई टूटे या न टूटे, टूटता ये शह्र है ।


कहता हूँ ग़ज़लों में अपनी रिश्तों की तासीर भी,

बोल जितने हैं ज़रूरी उतनी इसकी बह्र है ।


बिक़ता है इंसाफ अब तो हर जगह मक्कारी है,

अब सियासत भी फ़लक पे हर ज़ुबाँ पे ज़ह्र है ।


बे-वजह कुछ अपने छूटे मज़हबी इस दाव में,

ये हक़ीक़त जानकर भी ये सियासी बैर है ।


राज़-ए-उल्फ़त को बताना ये भी मेरा फ़र्ज़ था,

अपना तो अपना रहेगा ग़ैर फिर भी ग़ैर है ।


----हर्ष महाजन 'हर्ष'

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"दिल लगाकर हम ये समझे ज़िन्दगी क्या चीज़ है"