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मत सोच हम भी खेल में हारे नहीं हुए,
बस इतना फ़र्क है कि किनारे नहीं हुए ।
उनकी निग़ाहें नाज़ का मारा नहीं मग़र,
तहज़ीब इतनी थी कि इशारे नहीं हुए ।
ख़्वाहिश थी आके ख़ुद वो रिझा ले मुझे मग़र,
ख़त लिख के कह दिया कि तुम्हारे नहीं हुए ।
औरों के रंज ओ ग़म दिए उसने अगर मुझे,
फिर उनके क्यूँ नसीब हमारे नहीं हुए ।
हर शख्स चाहने लगा था इस कदर मुझे,
पर ज़िंदगी में वो भी सहारे नहीं हुए ।
-----हर्ष महाजन 'हर्ष'
बहर:-
221 2121 1221 212
मिलती है ज़िन्दगी में मुहब्बत कभी कभी
मत सोच हम भी खेल में हारे नहीं हुए,
बस इतना फ़र्क है कि किनारे नहीं हुए ।
उनकी निग़ाहें नाज़ का मारा नहीं मग़र,
तहज़ीब इतनी थी कि इशारे नहीं हुए ।
ख़्वाहिश थी आके ख़ुद वो रिझा ले मुझे मग़र,
ख़त लिख के कह दिया कि तुम्हारे नहीं हुए ।
औरों के रंज ओ ग़म दिए उसने अगर मुझे,
फिर उनके क्यूँ नसीब हमारे नहीं हुए ।
हर शख्स चाहने लगा था इस कदर मुझे,
पर ज़िंदगी में वो भी सहारे नहीं हुए ।
-----हर्ष महाजन 'हर्ष'
बहर:-
221 2121 1221 212
मिलती है ज़िन्दगी में मुहब्बत कभी कभी