Tuesday, January 11, 2022

तेरी सोहबत में दिल ये संभल जाएगा

तेरी सोहबत में दिल ये संभल जाएगा,
कर यकीं अब नहीं तो ये जल जाएगा ।

देख लेना कभी इश्क़ इन आँखोँ में,
थोड़ी चाहत दिखाना मचल जाएगा ।

तू ख़फ़ा है मुझे ये पता था मगर,
पर यकीं ये नहीं था बदल जायेगा ।

दिल में खामोशियाँ अब हैं पलने लगीं, 
थोड़ा बहला देगा ये उछल जाएगा ।

हमसफ़र छोड़ मेहमान बन तू मुझे,
कैसे कर लूँ यकीं मुझको छल जाएगा ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

Friday, January 7, 2022

जब कभी दिल किसी का दुखाया करो




जब कभी दिल किसी का दुखाया करो,
दो कदम ग़म के भी तो बढ़ाया करो ।

सिरफिरा भी कहे गर वो पागल भी फिर,
ऐसे नख़रे भी फिर तुम उठाया करो ।

जो कहा ही नहीं, उसने वो भी सुना,
फिर तो किस्मत पे आँसू बहाया करो ।

उम्र भर तुम ख़ताओं में मशगूल थे,
अपने दिल को भी ये तुम बताया करो ।

बेवफा निकली वो फिर कहा उसने ये,
धीरे-धीरे उसे तुम भुलाया करो ।

ग़म का है या खुशी का मगर कुछ तो है,
ये सफ़ऱ ज़िन्दगी का निभाया करो ।

जब चले जिक्र तेरा किसी बज़्म में,
दिल धड़कता तेरा भी सुनाया करो ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

बुझ गए जब दिए तो अँधेरा हुआ

बुझ गए जब दिए तो अँधेरा हुआ, 
चाँद निकला तो समझा सवेरा हुआ ।

ख़्वाब मेरे लिए उसकी आँखों में था,
टूटा, उसका हुआ अर न मेरा हुआ ।

इक चराग-ए-मुहब्बत जले दिल में फिर,
इसलिए नाम उसका उकेरा हुआ ।

फिर मुहब्बत में ऐसी चली आँधियाँ,
ज्यूँ समंदर में तूफाँ तरेरा हुआ ।

कल्पनाओं में इतनी उड़ाने भरीं,
हुस्न ऐसा था उसने बिखेरा हुआ ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

Thursday, January 6, 2022

कहीं चाहत न उसकी रूठ कर सर-ए-आम हो जाये

कहीं चाहत न उसकी रूठ कर सर-ए-आम हो जाये,
खुला दिल है खुला जज़्बात न इल्ज़ाम हो जाये ।

ग़ज़ल लिखता है वो या ख़्वाब लिखता महज़बीनों के,
मुझे डर है हसीनों में न वो बदनाम हो जाए  ।

बिलख़ते उसके अरमाँ मिल रही है ये सज़ा कैसी,
मिले गर आंखों से पीने को फिर आराम हो जाये ।

मरीज-ए-इश्क़ का दुनियाँ में लगता है नहीं कोई,
कहीं ये इश्क़ दुनियाँ से न अब नीलाम हो जाये ।

मेरे नग्मों की कीमत घट रही लिख-लिख सफीनों पर,
ज़ुबाँ दे दे कोई हर नग्में को वो जाम हो जाये ।

किसे होगा न अपने हुस्न पर क्यूँ नाज़ इतना जब,
किसी के वास्ते ये ज़िन्दगी पैगाम हो जाये ।

तसव्वुर में अगर न दिल लगे तो फिर चले आना,
कहा उसने मुहब्बत अबकि न नाकाम हो जाये ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222

Wednesday, January 5, 2022

खूबसूरत ग़ल्त-फहमी हो गयी

खूबसूरत ग़ल्त-फहमी  हो गयी,
बीज दिल में इक हसीना बो गयी  ।

क्यूँ उसे अब ढूँढता हूँ दर-बदर,
क्या मुक़द्दर में मुहब्बत हो गयी ।

ग़म खुशी के रंगों को बस देखकर,
मेरे हाथों की वो रेखा खो गयी ।

कर दिया इज़हार उसने प्यार का,
फिर अचानक मेरी धड़कन सो गयीं ।

रोशनी बुझने लगी दिए कि अब,
मेरे दिल से जो निकल के वो गयी ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 2122 212

चाँद जब तक फलक पर नुमाया नहीं

चाँद जब तक फलक पर नुमाया नहीं,
रुख से जुल्फों को उसने हटाया नहीं ।

उसको अहसास था मेरे ज़ख़्मों का पर,
अश्क़ पत्थर ने इक भी बहाया नहीं ।

मुफ़लिसी रिश्तों में बढ़ गयी इस कदर,
दिल धड़कता रहा पर बताया नहीं ।

मेरी नज़्मों ने उसको पुकारा बहुत,
थी कसक उसको भी पर रुलाया नहीं ।

सर झुका के मिला था मैं उसको मगर,
क्यूँ उठा के वो खंजर चलाया नहीं ।

अर्थी मेरी चली अर्थी उसकी चली,
पर्दा फिर भी किसी ने उठाया नहीं ।

दर्द सह कर भी इतना रहम दिल था 'हर्ष'
दिल दिया भी मगर दिल लगाया नहीं।

हर्ष कुमार 'हर्ष'
212 212 212 212

घाटियों के बीच इक वो शह्र है

घाटियों के बीच इक वो शह्र है,
आदमी रहते जहाँ अब कहर है ।

ज़िन्दगी कब तक उन्हें रौंदेगी अब,
कब तलक ये जंग उनकी सहर है ।

सरहदों पर जंग जारी है अभी,
जानें घाटी में ये कैसी लहर है ।

लोग जो बे-घर कभी थे हो गए,
दिल में उनके जाने कितना ज़हर है ।

जाने क्यूँ छेड़ी है मैनें ये ग़ज़ल,
कैसा मंज़र जाने कैसी बह्र है ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 2122 212