◆◆
दिलों को जीत लेती हैं तुम्हारी जो वफ़ाएं हैं,
मगर दुनिया के हाथों में पुरानी ही जफ़ाएं हैं।
दुआओं में असर की अब तलाशें अपनी इल्तिजाएं हैं,
झुकी सजदे में देखो मुल्तज़ी सबकी जबाएं हैं।
खुलें जो लब तो बस ज़िक्र-ए-मोहब्बत आम हो जाए,
फ़ज़ाओं में तो फिर गूँजे वही दिल की सदाएं हैं।
न पूछो मंज़िलों का हाल इन आवारा पैरों से,
मुसाफ़िर के मुक़द्दर में लिखी ऐसी सज़ाएं हैं।
ख़ुदा जाने कहाँ लेकर चलेंगी ये हवाएं अब,
उमड़ कर आ रही बादल की ये कैसी घटाएं हैं।
सितम सहकर भी 'शायर' मुस्कुराता ही रहा हरदम,
यही तो ज़िंदगी की खूबसूरत ये अदाएं हैं।
खिज़ां का खौफ़ क्या होगा जिसे मंज़िल न मिल पाई,
लहू से सींच दी हमने चमन की सब कथाएं हैं।
दुआ में हाथ जो उठता है तो महसूस होता है,
मिरे हक में ज़माने की बदलती अब दुआएं हैं।
ज़माने भर को भाती हैं मेरी पागल सी ये बातें,
सितम सह कर भी लब पर 'हर्ष' के रहतीं सदाएं हैं।
◆◆◆
हज़ज मुसम्मन सालिम
1222 1222 1222 1222