Thursday, February 26, 2026

दिलों को जीत लेती हैं तुम्हारी ये वफ़ाएं हैं,

  

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दिलों को जीत लेती हैं तुम्हारी जो वफ़ाएं हैं,
मगर दुनिया के हाथों में पुरानी ही जफ़ाएं हैं।

दुआओं में असर की अब तलाशें अपनी इल्तिजाएं हैं,
झुकी सजदे में देखो मुल्तज़ी सबकी जबाएं हैं।

खुलें जो लब तो बस ज़िक्र-ए-मोहब्बत आम हो जाए,
फ़ज़ाओं में तो फिर गूँजे वही दिल की सदाएं हैं।

न पूछो मंज़िलों का हाल इन आवारा पैरों से,
मुसाफ़िर के मुक़द्दर में लिखी ऐसी सज़ाएं हैं।

ख़ुदा जाने कहाँ लेकर चलेंगी ये हवाएं अब,
उमड़ कर आ रही बादल की ये कैसी घटाएं हैं।

सितम सहकर भी 'शायर' मुस्कुराता ही रहा हरदम,
यही तो ज़िंदगी की खूबसूरत ये अदाएं हैं।

खिज़ां का खौफ़ क्या होगा जिसे मंज़िल न मिल पाई,
लहू से सींच दी हमने चमन की सब कथाएं हैं।

दुआ में हाथ जो उठता है तो महसूस होता है,
मिरे हक में ज़माने की बदलती अब दुआएं हैं।

ज़माने भर को भाती हैं मेरी पागल सी ये बातें,
सितम सह कर भी लब पर 'हर्ष' के रहतीं सदाएं हैं।

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हज़ज मुसम्मन सालिम
1222 1222 1222 1222


Tuesday, February 24, 2026

कोई मय मिली न ही हम-सफर

 

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कोई मय मिली न ही हम-सफर,
कोई मैकदा भी मिला नहीं,
जो फ़ज़ा में घोल पिलायेगा,
कोई ऐसी दिल की दवा नहीं ।

वो तो ख्वाब था जो धुआँ हुआ,
जो मिला भी था वो फ़ना हुआ,
ये अजब सज़ा थी नसीब में,
कोई रास्ता भी दिखा नहीं ।

ये मुसाफिरों के हजूम में,
यहां कौन कितना अमीर है,
जो बुझा सके मेरी तिश्नगी,
कोई ऐसा भी तो मिला नहीं ।

कोई आके मझको करीब से,
सर-ए-राह मिल के बताएगा ?
ये जो बे-वफ़ा था मिला मुझे,
हुआ 'हर्ष' से क्यूँ ज़ुदा नहीं ।
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Kaamil murabba saalim
11212 11212

"न किसी की आँख का नूर हूँ"

Friday, February 20, 2026

ढलने लगी ये सांझ तो मुझको भुला दिया

 

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ढलने लगी ये सांझ तो मुझको भुला दिया,
इक ज़िंदगी ने ज़िंदगी को ही रुला दिया ।

वो जब मिले तो यूँ मिले इक ख्वाब की तरह,
दिल के मचलते प्यार में तूफाँ जगा दिया ।

लेकिन तू मुझको ये बता, मुझसे था क्या गिला,
इन साजिशों के शोलों में, दिल तक जला दिया ।

बदली की भाँति आये, बरस कर यूँ चल दिये,
मेरी हसीन चाह को, झटका लगा दिया ।

बे-वक़्त काली रात में, डूबे हैं इस तरह
ज्यूँ रोशनी को 'हर्ष' ने खुद ही दगा दिया ।

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मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
221 2121 1221 212


दिन भी हुआ धुआँ-धुआँ

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दिन भी हुआ धुआँ-धुआँ, रातें हुईं उदास,
अब आदमी के बीच हुआ आदमी खलास।

रहबर ही जब न मुल्क में छोड़ें कोई कसर,
पहने हुए हैं जिस्म पे सब काग़ज़ी लिबास।

फूँका किए हैं दूसरों के घर जो अब तलक,
अब अपने ही मकाँ का नहीं होता है अभास।

वादों का क्या कि काँच हैं, बस एक ठेस से,
टूटेंगे इस तरह से कि होगा नहीं उजास।

शिकवों के डर से आज भी मिलते नहीं हैं लोग,
इस शहर-ए-बे-हिसी में भला 'हर्ष' किसकी आस।
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शहर-ए-बे-हिसी=भावनाओं से रहित शहर

Wednesday, February 18, 2026

अपने आँगन में कोई गैर न पाला जाए

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अपने आँगन में कोई गैर न पाला जाए,
गर कोई अपना मिले उसको संभाला जाए ।

घर की इज़्ज़त पे किसी गैर की हो आँख अगर,
ऐसा हो शख्स कोई घर से निकाला जाए ।

जब भी हो जाये किसी गैर पे विश्वास कभी,
उसकी पुश्तों को भी इक बार खंगाला जाए ।

टूटकर रिश्ते कभी दिल से कहीं मिल जाएं,
ऐसे रिश्तों में कभी ज़हर न डाला जाए ।

दूर नज़रों से चला जाये कोई अपना तो 'हर्ष',
भूल कर उसपे यूँ पत्थर न उछाला जाए ।

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2122 1122 1122 22(112)

Tuesday, February 17, 2026

कितना था तंज उसके हर उठते सवाल में

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कितना था तंज उसके हर उठते सवाल में,
कुछ वो भी मुझसे तंग था कुछ मैं भी हाल में ।

चाहा जिसे वो शख्स था, मेरे ही ख्याल का,
वैसा नहीं था लुत्फ किसी के जमाल में ।

कैसे भी रंग दे दिल को, मुहब्बत के रंग से,
उम्रें गुजार दूँगा मैं फिर, देख भाल में।

नफरत मिटा सका न मैं, उसके मिजाज से
वाहिद मैं जी रहा हूँ उसी के मलाल में ।

कितना अलग था शख़्स वो, कितना था खुश-नशीं,
लेकिन मिला न कोई मुझे, उसकी मिसाल में ।

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मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
221 2121 1221 212

Tuesday, August 29, 2023

न दिल में रखना अना तू इतनी, कि वो मुहब्बत निगल न जाये

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न दिल में रखना अना तू इतनी, कि वो मुहब्बत निगल न जाये,

ख्याल रखना कि बिन तुम्हारे ये दिल से धड़कन निकल न जाये ।


तुम्हारी यादें हैं मेरी मंज़िल, तुझी से मेरा है आशियाँ अब,

बता दो तुम राजे दिल भी अपना, कहीं ये डर मुझको छल न जाये ।


थकी हैं पलकें हैं खुश्क आँखे, फ़क़त ये उलझन है बेबसी की,

हुए जो इतने निशब्द लब अब, कहीं ये चुप दिल को खल न जाए ।


ज़रा तो दिल में उतर के देखो, तमाम किस्से बदल गए हैं,

बड़ा ही दुश्मन है ये ज़माना, निगाहें उनकी निगल न जाये ।


उठी जो दिल पे ख़लिश सी इतनी, नज़र भी करती सवाल कितने,

कि अब अँधेरों की सरसराहट में दिल के अरमां ही ढल न जाये ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

12122 12122 12122 12122

"छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा कि जैसे मंदिर में लौ दिए की"