Monday, February 22, 2016

तेरे सिजदे में बाबा सर झुका कर मैं भी देखूंगा

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तेरे सिजदे में बाबा सर झुका कर मैं भी देखूंगा,
तले पांवों के होंमें खुद दबा कर मैं भी देखूंगा ।

तेरे इस नूर की चादर से दाता दूर मैं क्यूँ हूँ,
उठा दे पर्दा पापी का, दया कर मैं भी देखूंगा ।

मैं कामी क्रोधी लोभी और दाता तू है बक्शनहार,
तेरे दर्शन को अब सचखंड में आकर मैं भी देखूंगा ।

अनंत रूहों को तूने उनके पापों से उभारा है,
रूहानी मंडलों में तेरे जाकर मैं भी देखूंगा ।

मैं अपने ही अहम् का बरसों से मारा हुआ लेकिन,
हुई रहमत तेरी, दुंनियां भुलाकर मैं भी देखूंगा ।

-----------------------हर्ष महाजन

Friday, January 8, 2016

तेरी नज़रों से जो उतरूँ क्यूँ न मर जाऊं अभी

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तेरी नज़रों से जो उतरूँ क्यूँ न मर जाऊं अभी,
ज़िंदगी को यूँ ही रौशान क्यूँ न कर जाऊं अभी |
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ख्वाब बनकर मेरी आँखों में, समा जाए अगर,
ये नसीहत ही सही खुद....मैं सुधर जाऊं अभी |
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ये तमन्ना थी कि मुझको भी रिझाये तू कभी,
गर ये मुमकिन हो समंदर में उतर जाऊं अभी |
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बेवफा दुनिया कहे मुझको...तो परवाह है किसे,
बेवफा तू जो कहे तो.......न बिखर जाऊं अभी |
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ज़ुल्म इतने सहे दुश्मन की, निगाहों से सदा,
तू भी नफरत जो करेगी तो किधर जाऊं अभी |

हर्ष महाजन

तर्ज़ : “रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ”

Thursday, January 7, 2016

जाने अखियों से छलकते अश्क क्यूँ उस याद में

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जाने अखियों से छलकते अश्क क्यूँ उस याद में,
जिसने तडपाया मुझे जलती हुई इक आग में |

इतना गम बन आह निकले आज फिर इस ज़हन से,
दिल धड़कता भी रहेगा आस रख फ़रियाद में |

जिस्म से ज्यूँ रूह निकले होता क्या पूछो मुझे,
आरज़ू उसके मिलन की रह गई जब खवाब में |

ज़ुल्फ़ दिल पे यूँ थी काबिज़ भूल कर भूला नहीं,
चल रहा अब तक नशा देखा कभी न शराब में |

जिन हवाओं में कयामत अब तलक देखी न थी,
रूह को छू कर निकलती बन अदा वो शबाब में |

हर्ष महाजन

2122 2122 2122 212

Monday, November 16, 2015

चाहा जिसे था दिल के बंद दरवाजे ही मिले

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चाहा जिसे था दिल के बंद दरवाजे ही मिले ,
वो दोस्ती में मुझको बस अजमाते ही मिले |
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ज़ब्रो ज़फ़ा गरीबों पर जिस-जिस ने की अगर,
हर जुर्म खुद खुदा को वो लिखवाते ही मिले |

बदनाम वो शहर में पर, काबे का था मरीज़,
हर चोट भी ख़ुशी से सब बतियाते ही मिले |

वो यार था अजीजों सा, दुश्मन भी था मगर,
हर राज-ए-दिल उसे पर हम बतलाते ही मिले |

इस दौर में जिधर भी देखो गम ही गम हुए,
ऐ ‘हर्ष’ ज़िन्दगी में वो भी आधे ही मिले |

________हर्ष महाजन

ज़ब्रो ज़फ़ा = ज़बरदस्ती और अन्याय...
क़ाबे - House Of Allah In Mecca

बहर - r 2212 1222 2222 12

Monday, November 2, 2015

मेरी चिंता मत कर लेकिन, दिल की चिंता जारी रख

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मेरी चिंता मत कर लेकिन, दिल की चिंता जारी रख,
कितने बलवे झेले तूने, यारों से अब यारी रख |

उनके ज़ुल्मों से तंग आकर, मर्यादा मत भूलो तुम,
कर्मों का सब लेखा है ये,  अपना मन मत भारी रख ।

जब देखो वो सरहद पर, बारूदी खेलों में मशगूल,
ताँका-झांकी बंद न होगी अपनी भी तैयारी रख ।

कब तक बिजली गर्जन कर तू बादल पर मंडरायेगी,
पापी तुझको भूलें हैं सब, अपनी भागीदारी रख ।

मैखाने में गिर कर उठना पीने वालों का दस्तूर,
मत गिर जाना नज़रों से तू, इतनी तो खुद्दारी रख ।

_____________हर्ष महाजन ©

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Saturday, October 24, 2015

दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ,

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दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ,
इस ज़िन्दगी में तुझसे यही सिलसिला करूँ |

दिन भर शराब पी के हुआ,था मैं दरबदर,
अब ढूंढता हूँ चादर ग़मों की सिला करूँ |

नफरत थी जिन दिलों में, भुलाया नहीं मुझे,
दिल में बता खुदा, उनके, कैसे खिला करूँ |

अमन-ओ-अमां के साये ही जिनसे नसीब हो,
ऐसे चमन जमी दर ज़मीं काफिला करूँ |

तन्हा है सब सफ़र और तनहा हैं रास्ते,
अब सोचता हूँ तुझसे यहाँ ही मिला करूँ |

© हर्ष महाजन

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Tuesday, October 13, 2015

बन गया मैं यूँ खुदा, सूली पे चढ़ जाने के बाद

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बन गया मैं यूँ खुदा, सूली पे चढ़ जाने के बाद,
पत्थरों में पूजे मुझको, अब सितम ढाने के बाद |
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बनके पत्थर देखता हूँ, इंतिहा बुत परस्ती की,
फूल बरसाए है दुनियां, चोट बरसाने के बाद |

मैं था पागल इश्क में, उसको न जाने क्या हुआ,
लौ बुझा दी इस दीये की, इतना समझाने के बाद |

बे-वफाई छेदती है, नर्म दिल की परतों को,
हूर रुख्सत हो कभी दिल में वो बस जाने के बाद |

इतना रोया हूँ, मगर अब, अश्क आँखों में नहीं,
पत्थरों के शहर में पत्थर हुआ आने के बाद |

हर्ष महाजन ©

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