Friday, May 8, 2015

मुझे गम है मेरा कोई यहाँ दीवाना नहीं है



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मुझे गम है मेरा कोई यहाँ दीवाना नहीं है,
यकीनन दुनिया ने मुझको यहाँ पहचाना नहीं है । 

हुआ हूँ पारा-पारा देख ज़माने की अदाओं को,
मुझे क्यूँ लगता था कोई यहाँ बेगाना नहीं है ।

चले तलवारों की माफिक जुबां अपने करीबों की,
लगे वेसे भी अब मौसम यहाँ सुहाना नहीं है ।

हुए हमदर्द अब दुश्मन खुदाया दे कफन मुझको,
यहाँ बे-दर्द दुनिया में मेरा ठिकाना नहीं है ।

तजुर्बा हो गया मुझको सहे जो शोले नफरत के
हुई जो साजिशें पर 'हर्ष' यहाँ अनजाना नहीं है ।


© हर्ष महाजन


पुरानी कृति

Thursday, May 7, 2015

हुई यूँ ग़मों की ये शाम आखिरी है

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हुई यूँ ग़मों की ये शाम आखिरी है,
पहना दो कफन ये सलाम आखिरी है |

यूँ भर के ये अखियाँ टपकते जो आंसू ,
वो कहते हैं पीलो ये जाम आखिरी है |

सफ़र आखिरी है कदम दो मिला लो,
खुदा का दिया इंतजाम आखिरी है |

टपकते रहे पर, सकूं था कि इतना,
गमे ज़िन्दगी का इनाम आखिरी है |

यूँ ख्वाबों में हर पल रहे उम्र भर जो,
उन्ही के लिए ये कलाम आखिरी है |

महक तेरे दामन की चारों तरफ है,
यूँ समझो खुदा का पयाम आखिरी है |

 

© हर्ष महाजन


पुरानी कृति

Wednesday, May 6, 2015

दिल-ए-ग़मज़दा को सताओगे क्या तुम



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दिल-ए-ग़मज़दा को सताओगे क्या तुम,
मुझे बार-बार आजमाओगे क्या तुम |

ये हम हैं कि अब तक परेशाँ हैं,
शब्-ए-हिज्राँ की ताब लाओगे क्या तुम |


बस इतनी सी इक बात मैं पूछता हूँ,
कभी मुझको अपना बनाओगे क्या तुम |


न छोड़ोगे मर कर भी दामन हमारा,
जो वादा किया था निभाओगे क्या तुम |


गम-ए-ज़िन्दगी, ज़िंदगी बन चुका है,
हंसा कर मुझे अब रुलाओगे क्या तुम |


‘हर्ष’ आज मुल्क-ए-अदम से चला है,
इस बार ज़िन्दगी संग आओगे क्या तुम |


© हर्ष महाजन

Tuesday, May 5, 2015

कैसा है अब शोर यहाँ पर दिखते हैं घबराए लोग



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कैसा है अब शोर यहाँ पर दिखते हैं घबराए लोग,
ढूँढा करते प्यार यहाँ पर सदियों से ठुकराए लोग |

बिक जाते ईमान यहाँ पर बिक जाती हैं नीयत भी,
ज़र्रा-ज़र्रा लूटा हमसे जब-जब मिलने आये लोग |


ख़त्म हुए हैं जज्बे दिल के ख़तम हुए सारे अहसास,
अपने ही कांधों पर फिरते अपनी लाश उठाये लोग |


हर इंसान के दिल में उठता प्यार का इक ऐसा तूफ़ान,
जिसके बहाने जी पाते हैं हम जैसे पथराये लोग |


कफन अधूरा लकड़ी अधूरी अधूरा अपनों का ईमान,
चिता से उठती आग से देखो घर का दीप जलायें  लोग |


© हर्ष महाजन

एक पुरानी कृति

Monday, May 4, 2015

तू रकीबों की जानिब सरकती रही




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तू रकीबों की जानिब सरकती रही,
मैं सुलगता रहा तू बहकती रही
|

मैं तेरे अंजुमन में यूँ ही रात दिन,
बस टहलता रहा तू बिखरती रही
|

तू यूँ ग़ैरों की महफ़िल में हँसती रही
,
मैं तो घुटता रहा तू मचलती रही
|

मैं तो जज़्बातों में ख्व़ाब बुनता रहा,
रफ्ता-रफ्ता ज़फ़ा कर तु छलती रही |


मैं तेरी राहों से शूल चुनता रहा
,
पर तू राहों में राहें बदलती रही
|

मेरे ख़्वाबों की महफ़िल में लौट आओ अब,
मेरी मंजिल यही तू कुचलती रही
|

अब तो ख़्वाबों की मह्फ़िल से लौट आ यहाँ,
चल उसी राह जिस राह चलती रही |

© हर्ष महाजन
212 212 212 212





26th अप्रैल 2009
http://harashmahajan.blogspot.in/search?q=Tu+rakeeboN+ki+jaanib+sarakti+rahi

Sunday, May 3, 2015

आओ चलेंगे हम भी खुश्बू के शहर में

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आओ चलेंगे हम भी खुश्बू के शहर में,
ग़ज़लें पड़ी हैं मेरी कुछ कर लें बहर में |

गर लिख दूं अपनी यादें किताबों की तरह,
होंगे बहुत से बलवे फिर यूँ ही शहर में |

कैसे बनेगा गुलशन अब फूलों के बिना,
उजड़ी हैं कलियाँ इतनी रिश्तों के ज़हर में |

गर खौलते है वो अब यूँ पानी की तरह,
हम आफताब-ए-गम से जलते दोपहर में |

अब कौन जाने कीमत जज्बातों की ‘हर्ष’,
कैसे बचाऊँ इनको अल्फासों के कहर में |
© हर्ष महाजन