Sunday, April 19, 2020

बिना साज़ जो भी सजेगी ग़ज़ल

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बिना साज़ जो भी सजेगी ग़ज़ल,
वो धड़कन की धुन पे चलेगी ग़ज़ल ।

उठेगी कभी दिल से लब तक कभी,
यकीनन ज़ुबाँ पे सजेगी ग़ज़ल ।

अगर सांचे में ढ़ल न पाएँगे लफ्ज़,
तो बन के सज़ा वो खलेगी ग़ज़ल ।

चमन गर न बदला न बदली फ़िज़ा,
अंधेरों में खुद ही बनेगी ग़ज़ल ।

अगर ग़म समंदर हुआ अश्क़ों का
तो दिल में सुलगकर जलेगी  ग़ज़ल ।

कभी होगा आँखोँ से दिल तक सफर,
वही 'हर्ष' तुझको फलेगी ग़ज़ल ।

 हर्ष महाजन 'हर्ष'
122 122 122 12(22)

Wednesday, April 15, 2020

रुख़ से पर्दा उठा के देख लिया (तरही)

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रुख़ से पर्दा उठा के देख लिया,
बिजली दिल पे गिरा के देख लिया ।

घुटनों के बल जो चल सकूँ खुद ही,
उसने आंगन बना के देख लिया ।

टूटकर भी वो ज़िद्द पे था काबिज़, 
ख़ुद को अश्कों में ला के देख लिया ।

रौशनी फिर भी हो सकी न कभी,
दिल को दीया बना के देख लिया ।

उनका दिल से निकलना था वाज़िब ,
ये भी दिल को सुना के देख लिया ।

होगा मिलने से कुछ नहीं हासिल
*बा रहा आज़मा के देख लिया ।*

ज़ुल्फ़ें रूख़ पे गिरीं थी यूँ शायद,
चाँद उनमें छुपा के  देख लिया ।

कद्र जो कर सका बशर न कोई,
ऐसी दुनिया बसा के देख लिया ।

ज़ख्म दिल के सभी उभर आए
खुद ही पर्दा हटा के देख लिया ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1212 22(112)

बा-रहा=प्राय:

Sunday, April 12, 2020

तन्हा बैठे हो कुछ तो इशारा करो

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तन्हा बैठे हो कुछ तो इशारा करो, 
सोच अपनी कभी तो अवारा करो ।

जब कभी मॉज़ों में मन बहलने लगे,
तो समंदर में कश्ती उतारा करो ।

उम्र भर उँगलियों पे नचाया मुझे,
आज मौका है तुम भी तो हारा करो ।

खुशबुओं से अगर तरबतर ने लगूँ,
हक़ तुम्हें भी है दिल को अँगारा करो ।

शाम को जब कभी घर पे आया करो,
मेरी ज़ुल्फ़ों को खुद ही सँवारा करो ।

शेर तुम हो अगर, मैं हुँ तेरी ग़ज़ल ,
आज से गा के मुझको पुकारा करो ।

ज़ुल्म करके मुझे क़ैद कर लो अगर,
नज़्र से पी के सर पे भी वारा करो । 

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 212 212 212

Friday, April 10, 2020

हिन्द की दहलीज़ पर ऐसी फ़िज़ा रख जाऊँगा

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हिन्द की दहलीज़ पर ऐसी फ़िज़ा रख जाऊँगा,
मज़हबी खुश्बु से महकी इक वफ़ा रख जाऊंगा ।

सरहदों से आ रहे जो बीज नफ़रत के मगर,
मरक़ज़ों में मैं फ़िज़ाओं की हवा रख जाऊँगा ।

कौन जाने किस घड़ी खो जाए अब किसका सफ़र,
हर डगर पे मैं मुहब्बत का दिया रख जाऊँगा ।

गर यकीं तुमको निगाहें ग़ैर सी रखतें है तो,
आने वाली नस्ल पर इक हादसा रख जाऊँगा ।

रंग गर दरिया-दिली से बन्दग़ी का चढ़ गया,
टूटकर भी हर तरफ मैं इक नशा रख जाऊँगा ।

हादसों में बस्तियाँ गर नफ़रतों से भर गयीं,
रख यकीं मैं जंग का मक़सद नया रख जाऊँगा ।


-हर्ष महाजन 'हर्ष'

Saturday, April 4, 2020

किताब ए ज़िन्दगी में देखे थे ईमान के दुश्मन

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किताब ए ज़िन्दगी में देखे थे ईमान के दुश्मन,
ज़माने भर के तबलीगी हुए इंसान के दुश्मन,

मिटा है इस कदर इस मुल्क से चैनो अमन देखो,
मुहब्बत भूल थी इनसे, हुए ये जान के दुश्मन ।

गुनाहों का ये आलम देखो तो इतने ये बे-गैरत,
सियासत ताक पे रख, हो गए फरमान के दुश्मन ।

ये सोचा था दिवारें मज़हबी हम तोड़ डालेंगे
मगर सद्भावना में हो रहे बलिदान के दुश्मन ।

सबाब ए इश्क की दौलत तो भारत में बहुत लेकिन,
उठी नफरत की ऐसी बाढ़ कि हलकान है दुश्मन ।

कि रोको अब तबाही के ये मंज़र ज़हर उगलेंगे,
पलट दो उनके मंसूबे जो हिंदोस्तान के दुश्मन ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
1222 1222 1222 1222

Friday, April 3, 2020

सभी इस क़ज़ा में रज़ा हो गए ।


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सभी इस क़ज़ा* में रज़ा* हो गए ।
मगर कुछ नमाज़ी ज़ुदा हो गए ।

मुहब्बत में हम किसी से कम तो नहीं,
मगर सरफिरे कुछ ख़फ़ा हो गए ।

जहाँ फ़ासलों पर अमल न हुआ,
वहाँ कुछ बशर* ग़मज़दा हो गए ।

जिन्हें मान अपना निभाते रहे,
वही हमवतन अब ख़ुदा हो गए ।

सियासत कहीं बेअसर तो नहीं ?
हैं कुछ शह्र में बा-ख़ता हो गए ।

यूँ सीने में अहसास जिनके नहीं,
हमारे लिए वो सज़ा हो गए ।

ख़तावार को गर सज़ा न हुई,
तो हम बे-ख़ता बे-हया हो गए ।

चलो मिट चलें अब अमन के लिये,
सभी हमनफस*, हमनवा* हो गए ।

ख़ुदा हमको ऐसी ख़ुदाई न दे,
जहाँ हुक्मरां ही सज़ा हो गए ।

------हर्ष महाजन 'हर्ष'
122 122 122 12
तुम्हारी नज़र क्यूँ खफा हो गयी ।
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*क़ज़ा=कर्तव्यपालनता
रज़ा=राज़ी होना
बशर=आदमी
हमनफस=एक साथ सांस लेने वाले ।
हमनवा=एक साथ आवाज देने वाले

Wednesday, April 1, 2020

जो दिल्ली को मैयत बनाने लगे

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जो दिल्ली को मैयत बनाने लगे, 
वो मरकज़ में महफ़िल सजाने लगे ।

वो कैसी थी मस्ज़िद थी कैसी दुकाँ,
जहां लौ से लौ वो जलाने लगे ।

हकीकत परखने को राजी न थे,
वो पतझड़ सा खुद को गिराने लगे ।

हुए रूबरू तो मिले कुछ निशाँ,
बिना जंग लाशें बिछाने लगे ।

ज़नाजे बहुत निकलेंगे अब यहाँ,
हवा के थपेड़े बताने लगे ।

---------हर्ष महाजन 'हर्ष'

122 122 122 12
बहारों ने मेरा चमन लूट कर