Monday, August 16, 2021

आबरू वतन की आज यूँ बची कि क्या कहें

 

कारगिल युद्ध, जिसे ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है।




आबरू वतन की आज यूँ बची कि क्या कहें,
फौज़ अपनी कारगिल में यूँ लड़ी कि क्या कहें ।

दुश्मनों के काफिले जो हिन्द की ज़मीं पे थे,
फौज़ ए हिन्द बन के शोला यूँ लड़ी के क्या कहें ।

दहले थे वो लाडलों की माँओ के तो दिल ही थे,
देख कर तिरंगे में वो यूँ खड़ी कि क्या कहें ।

एक तरफ जंग कारगिल की दूजी थी सियासती,
जंग ये सियासतों ने यूँ लड़ी कि क्या कहें ।

दुश्मनों के संग दोस्ती निभा रहा था हिन्द,
दोस्ती ये छल के महँगी यूँ पड़ी कि क्या कहें ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 1212 1212 1212
"मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कसूर है"


आसतीं में सांप है अब जाने कितने

 

आसतीं में सांप है अब जाने कितने,
हम रहे बेख़ौफ़ यूँ बेगाने कितने ।

अपने ही हमराज अब समझाने निकले,
चोट खाके भी हैं हम अनजाने कितने ।

नफ़रतों के साये में हम तन्हा तन्हा,
रिश्ते लगते हो गए वीराने कितने ।

साजिशों को हादसा समझा किये हम,
बन गए अनजाने में अनजाने कितने ।

पर्दा सरका आँख से जब हरसु जानिब,
टूटे सब रिश्ते बने अफसाने कितने ।

रौशनी जब मांग ली जलते दियों से,
वो बहाने यूँ लगे बरसाने कितने ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 2122 2122
"छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा"


Saturday, August 7, 2021

गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,

गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,
हम मुहब्बत में हैं लेकिन दुश्मनी करते रहे |

दिल तो था मजबूर लेकिन आँखे आब-ए-चश्म थीं,
पर कदम बढ़ते रहे उनके सितम चलते रहे |

हर सितम आखों में उनकी आइने सा यूँ छला,
हम भी पहलू में दिया बन जलते अर बुझते रहे |

इश्क में खुद शूल बन वो सीने में चुभने लगे,
फिर वही ग़म ज़िंदगी में घुँघरू बन बजते रहे |

कैसे लिख दें दास्ताँ अपने ही लफ़्ज़ों में सनम,
ग़म समंदर हो चले अब दिल में जो पलते रहे |

_______हर्ष महाजन 'हर्ष'

आब-ए-चश्म = आंसू

बहरे रमल मुसम्मन महजूफ
2122-2122-2122-212



सर-ए-आम यूँ ही जुल्फ संवारा न कीजिये


सर-ए-आम यूँ ही जुल्फ संवारा न कीजिये
बे-मौत हमको हुस्न से मारा न कीजिये |

लहराते हैं यूँ गेसू कि दिल भी मचल उठे,
काँधे को यूँ अदा से उसारा न कीजिये |

रुखसार पर परीशां हो बरपा रहीं कहर,
ये नागिनों सी ज़ुल्फ़ अवारा न कीजिये |

कुंडल बनी है लट तिरी आँखें हैं छल रहीं,
आ आ के ख्वाब में यूँ इशारा न कीजिये |

जब झटकते हो ज़ुल्फ़ मेरी शायरी बने,
अब बाँध इनको जाम तो खारा न कीजिये |

ये ज़ुल्फ़ यूँ गिराईं कि दिल ही दहल उठा,
है इल्तिजा ये भूल दुबारा न कीजिये |

हर्ष महाजन 'हर्ष'
221 2121 1221 212


©1988

मेरा दिल मुझसे बदगुमा लेकिन


मेरा दिल मुझसे बदगुमां लेकिन,
ये तो कातिल है रहनुमां लेकिन |

दिल है रंगीन महफ़िलों पे फ़िदा,
हरसूं ज़ख्मों के हैं निशां लेकिन |

कितने हैं दर्द अश्क कहते हैं ये,
दिल में रोशन है इक समां लेकिन |

मैं भी सदमें में संग रोया बहुत, 
मुझपे इतना था मेहरबां लेकिन |

कितने ही दर्द इश्क में था लिए,
बंद है दिल की अब जुबां लेकिन |

आज जाने की बात मत करना,
अश्क रुकते न दर्द भी लेकिन |

_______हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1212 22(112)
"ज़िक्र होता है जब कयामत का"

Thursday, July 22, 2021

वो टिम-टिम सितारों को छिपना ही होगा

 ये रुख अब हवा का बदलने लगा है,

यूँ मौसम ये शोला उगलने लगा है ।


पता जब चला साजिशों का था हमको,

तो दिल कातिलों का दहलने लगा है ।


भला कब तलक क़ैद साँसे रहेंगी,

कवच वादियों का पिघलने लगा है ।


क्यूँ गुमराह होंगी दिशाएँ ये कब तक,

ये तेवर फ़लक का बदलने लगा है ।


हवाओं में फौलाद जैसा है जादू,

घटाओं का आलम छिटकने लगा है।


वो टिम-टिम सितारों को छिपना ही होगा,

अँधेरे में सूरज निकलने लगा है ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

बह्र:

122 122 122 122

Saturday, July 17, 2021

इतना हुआ था बे-कदर ज़ख्मों को पी गया

 2212 2212 2212 12


इतना हुआ बे-कदर इन ज़ख्मों को पी गया,

इक बे-वफ़ा सी ज़िंदगी अश्कों मे जी गया |


कुछ इस तरह है अब मेरी यादोँ का ये सफ़र,

कुछ रिस रहें हैं ज़ख़्म अब कुछ मैं ही सी गया ।


यूँ इस तरह से गर्दिशों में छोड़कर मुझे,

नज़रों में था जो शख्स मेरे दिल से भी गया ।


दुनियाँ में जो मैं जी रहा इज़्ज़त ओ शान से,

क्या गर्दिश-ए-दौरा चला फिर नाम ही गया ।


वो बे-वफ़ा या बे-हया था यार वो मेरा,

शिकवे ज़ुबाँ पे रंज-ओ-ग़म ख़ुद मैं ही पी गया ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'