Monday, April 11, 2016

अगर दिल पर मेरे उसका कभी इख्तियार हो जाता



...

अगर दिल पर मेरे उसका कभी इख्तियार हो जाता,
ये हस्ती तक बिखर जाती मुझे इंतज़ार हो जाता |
.
मैं कुछ अपने गुनाहों से परेशाँ और मुमकिन ये,
अगर मैं खोल देता दिल वो फिर राजदार हो जाता |

न मस्ती में चले थे हम न मस्ती को ही भूले थे,
अगर तीरे नज़र चलता ये दिल आर-पार हो जाता |

अमानत थी किसी की और आखों में कशिश इतनी,
मैं थोड़ा भी मचल जाता तो दिल तार-तार हो जाता |


बिछुड़ के रो चुका हूँ बे-वजह उस पे था दिल इतना,
न पगलाता ज़हन मेरा तो मैं होशियार हो जाता |


-----हर्ष महाजन

Sunday, April 10, 2016

इतनी करो भी हमसे शरारत न यूँ कभी



...

इतनी करो भी हमसे शरारत न यूँ कभी,
आँखों से उठ ही जाए शराफत न यूं कभी |
.
देखे, जो चांदनी में, नहाया तिरा बदन,
हो जाए अब शहर में बगावत न यूं कभी |
.
वो चाँद जब फलक से कभी इस तरह झुके,
देखी है इस तरह की, इबादत न यूं कभी |
.
आओ, चलें चमन से, कहीं दूर, गुलबदन,
ये चाँदनी, करे वो, खिलाफत न यूं कभी |
.
चर्चे तिरे, शहर में, जफाओं के, इस तरह,
लगने लगे ये दिल में अदालत न यूं कभी |
.
हर्ष महाजन

221 2121 1221 212

हुआ था खुश्क कभी दर्द-ए-ज़ख्म आज भी है

...

हुआ था खुश्क कभी दर्द-ए-ज़ख्म आज भी है,
दीदा-ए-तर है मगर दिल तो नर्म आज भी है |

हुआ जो फुर्कत में साज़-ए-दिल शराब बनी,
नशा था तुझसे हुआ मुझमें मर्ज़ आज भी है |

लिखूंगा तुझपे ग़ज़ल अब तलक है याद मुझे,
बिखर गया दो-जहाँ तेरा क़र्ज़ आज भी है |

तलाशता हूँ अमल, कागजों पे हर्फ़ करूँ ,
किया जो मैंने कभी उसकी शर्म आज भी है | 

जलूँगा तुझपे अलख बन दिया मज़ार पे अब,
कि तुझको याद रहे मुझको गर्ज़ आज भी है |


__________हर्ष महाजन



बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
1212 1122 1212 112
दीदा-ए-तर = भीगी आँख
फुर्कत = अलगाव separation

Friday, April 8, 2016

इन हवाओं से कभी तेरा पता पूछूँगा,

🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝

इन हवाओं से कभी तेरा पता पूछूँगा,
किस तरह छूटे मुझे तेरा नशा पूछूँगा ।

जाने क्यूँ ली थी कसम तू ने जुदा होने की,
तेरी धड़कन की सदाओं से सज़ा पूछूँगा ।

मुंतज़िर हूँ कि सितारो से फलक हो रौशन,
यूँ अंधेरों में बता किस से पता पूछूँगा ।

सैंकडों ख्वाब तेरे, नींद, चश्म से ओझल,
अश्क़ आँखों में मगर रस्में क़ज़ा पूछूँगा ।

ज़िन्दगी ख़ाक हूई आस सिफर होने तक,
अब सजेगी तेरी मजलिस तो ख़ता पूछूँगा ।

-------------------हर्ष महाजन

🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝🐝

2122-1122-1122-22

Thursday, April 7, 2016

कहीं दिल की गहराइयों में पड़ा है

...

कहीं दिल की गहराइयों में पड़ा है,
जवाँ दर्द है.........मुद्दतों से पला है ।

कभी बे-वफाई कभी छल का तकमा,
मुझे गैर क्या अपनों से भी मिला है ।

मैं तंग आ चुका, कश्मकश ज़िन्दगी से,
जो आरा ज़फ़ा का, यूँ दिल पे चला है ।

चले संग थे जो,.....वो आगे खड़े हैं,
सभी कुछ है पर मैं, वहीँ पे खड़ा हूँ ।

समंदर में कश्ती.....बही जा रही है,
है तूफां वो माझी......नशे में पड़ा है ।

-------------------हर्ष महाजन

बहर
122 122 122 122

Tuesday, April 5, 2016

मुझे दिल में अपने सजा कर तो देखो

...

मुझे दिल में अपने सजा कर तो देखो
फकत हूँ तेरा दिल लगा कर तो देखो ।

ये चाहत मेरी तुम मिलो तो समझना,
ये रिश्ता कभी तुम निभाकर तो देखो ।

ये दूनियाँ है मुर्दा-परस्तों की बस्ती,
किसी शख्स को आजमाकर तो देखो ।

कहीं लुटती अस्मत कहीं अगजनी है,
ये आँखों से पर्दा हटाकर तो देखो ।

बहुत चर्चे करता....जहाँ खुदकशी पर,
कभी बोझ उस सा बना कर तो देखो ।

सियासत को भी बिकते देखा है हमने,
ये अखबार कोई उठाकर तो देखो ।

---------------हर्ष महाजन

बहरे मुतकारिब मुसम्मन सालिम
122-122-122-122

Monday, April 4, 2016

हर वक़्त दिल दुखाने की बात करता है


...

हर वक़्त दिल दुखाने की बात करता है,
पागल है दिल लगाने की बात करता है ।

कितने अजब ख्यालात हैं उस बशर के,
सहरा में घर बसाने की बात करता है |

उतरा न ज़िंदगी में कभी अश्क़ आँखों से,
अब अश्कों में नहाने की बात करता है |

सुफिआना इल्म बे-इंतिहा उसके ज़हन में,
पर आज वो मैखाने की बात करता है |

नफरत जिसे बहुत थी कभी इश्क़ से पर
अब ज़ुल्फ़ को सजाने की बात करता है।

पूछा नहीं खुदा को भी, जिसने, अना में,
दिल धड़का तो ज़माने की बात करता है |

_______________हर्ष महाजन

बशर = आदमी



221 2122 1212 22