Monday, November 29, 2021

ओस की बूंदें जब हमको मोती लगें,

ओस की बूंदें जब हमको मोती लगें,

दूबों पर टिकती हमको वो सोती लगें ।


उँगलियों से उन्हें छू के देखूँ मैं जब,

वो सितारों को खुद में ही खोती लगें ।


मुट्ठियों में कभी बन्द कर लूँ भी गर,

जो लकीरें है हाथों में धोती लगें ।


जब वो पत्तों से छल-छल सी धुन वो करें,

गिर के टप-टप वो सुंदर सी मोती लगें ।


उँगली के पोरों पे कैद जब भी करूँ,

दिल में उठती उमंगों को ढोती लगें ।


हर्ष महाजन 'हर्ष'

212 212 212 212

Tuesday, October 26, 2021

मेरे हर सफ़ऱ में अगर तुम न होते

 

मेरे हर सफ़ऱ में अगर तुम न होते,
ग़मों में गुजरती खिजां रोते-रोते |

हैं दुश्मन मिरे इस जहां में बहुत अब,
समंदर-ए-वफ़ा में लगे थे जो गोते ।

यूँ लिखते हुए 'गम' कलम डगमगाए
थका हूँ मैं साहिल ये हुनर ढोते-ढोते |

पहर आखिरी जब शब्-ए-हिज्राँ बीती,
लुटे हम ख़ुदी में फ़लक होते-होते |

सितम ज़िन्दगी ने किये हैं मुसलसल,
मगर कर्मों को मैं थका धोते-धोते ।

.हर्ष महाजन 'हर्ष'

122 122 122 122

ख़ुदी=अहँकार


Sunday, October 17, 2021

बड़ी चोट खाई जवां होते-होते

 

बड़ी चोट खाई जवां होते-होते,
यूँ गुजरे थे हम इश्क़ में रोते-रोते ।

ज़माने ने लिख दी अजब बेवफाई,
ये इल्जाम ले हम थके ढोते-ढोते  ।

यूँ किसके लिए हम बता अब तू साहिल,
कभी तो तू ख्वाबों में मिल सोते-सोते ।

तमन्ना है फुरसत से जुल्फों को तेरी,
संवारेंगे हाथों सहम खोते-खोते ।

बसर हो न अब ज़िंदगानी ये तेरी,
ये रिसते हुए ज़ख़्म अब धोते-धोते ।

--हर्ष महाजन 'हर्ष' ©
"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ'


Friday, October 8, 2021

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं

 

मुझको वो मेरे गुनाहों की सज़ा देते हैं, 
ज़ह्र देते है वो फिर खुद ही दवा देते है ।

खौफ़ दुनिया का है जो इश्क खता कहते हैं, 
करके शोला ये बदन फिर क्यूँ हवा देते हैं |

इश्क भी करते हैं वो ज़ह्र असर होने तक, 
ज़ख़्म भी देते हैं वो फिर क्यूँ दुआ देते हैं |

बे-वफ़ा है वो मगर दिल है कि मानेगा नहीं,
दर्द शेरों से मेरे दिल के हरा देते हैं |

'हर्ष" जब कहता है खुद को ही बगावत कर ले,
खुद यूँ हाथों की लकीरों को मिटा देते है ।

___हर्ष महाजन 'हर्ष'©
9 अक्टूबर 2012
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Sunday, August 29, 2021

अगर दिल पर मेरे उसका कभी इख्तियार हो जाता

 अगर दिल पर मेरे उसका कभी इख्तियार हो जाता,
ये हस्ती तक बिखर जाती मुझे इंतज़ार हो जाता |

मैं खुद अपनी निगाहों से गिरा और ये भी मुमकिन था,
कभी मैं खोल देता दिल, वो फिर राजदार हो जाता |

ये तो अच्छा हुआ वो रूठ कर यूँ ही चल दिए मुझसे,
अगर तीरे नज़र चलता तो दिल आर-पार हो जाता |

अमानत थी किसी की फिर भी इस दिल को रखना काबू में,
कशिश इतनी थी आँखों में ये दिल तार-तार हो जाता |

बिछुड़ के रो चुका हूँ बे-वजह वो तो दिल था बेगाना,
न पगलाता ये दिल मेरा तो मैं होशियार हो जाता |

_____हर्ष महाजन 'हर्ष'
09 मार्च 2016

Non standard Behr.
1222 1222 1221 2122 2

Thursday, August 26, 2021


अब तेरा मेरा जाने बसर है कि नहीं है,
जो घाव दिए तूने ख़बर है कि नहीं है ।

महफ़िल से अचानक ही अधर में चले जाना,
देखो तो ग़ज़ल में वो असर है कि नहीं है | 

छलनी जो किया तूने हुआ कैसे मैं जालिम, 
अब सोच कोई मुझमें कसर है कि नहीं है |

इतना था हुआ रंज मुझे खुदकशी चुनी, 
सोचा न समंदर में भँवर है कि नहीं है |  

मैं तुझसे परेशान हुआ अश्क़ों से ख़ारिज़,  
जानू न मुकद्दर में ठहर है कि नहीं है |

________हर्ष महाजन 'हर्ष' "©
©15 जून 2016 फेसबुक
बहरे हज़ज़ मुसम्मन अखरब महफूफ महजूफ 
221 - 1221 - 1221 - 122

Monday, August 16, 2021

आबरू वतन की आज यूँ बची कि क्या कहें

 

कारगिल युद्ध, जिसे ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है।




आबरू वतन की आज यूँ बची कि क्या कहें,
फौज़ अपनी कारगिल में यूँ लड़ी कि क्या कहें ।

दुश्मनों के काफिले जो हिन्द की ज़मीं पे थे,
फौज़ ए हिन्द बन के शोला यूँ लड़ी के क्या कहें ।

दहले थे वो लाडलों की माँओ के तो दिल ही थे,
देख कर तिरंगे में वो यूँ खड़ी कि क्या कहें ।

एक तरफ जंग कारगिल की दूजी थी सियासती,
जंग ये सियासतों ने यूँ लड़ी कि क्या कहें ।

दुश्मनों के संग दोस्ती निभा रहा था हिन्द,
दोस्ती ये छल के महँगी यूँ पड़ी कि क्या कहें ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
212 1212 1212 1212
"मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कसूर है"