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Thursday, June 16, 2016

हुआ इश्क़ में सब सिफर रोते-रोते

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हुआ इश्क़ में सब सिफर रोते-रोते,
बहुत खोया मैंने उमर होते होते ।

मैँ कहता रहा हूँ ग़मों के फ़साने,
यूँ तड़पा बहुत ये हुनर खोते-खोते ।

यूँ अश्क़ों में भीगा रहा उम्र भर मैं,
ये कब तक चलेगा सफ़र रोते-रोते ।

दुआ मैं करूँ क्या खुदाओं से हर दम,
थका हूँ वफ़ा का ज़िकर बोते-बोते ।

न जाने चलेंगी यूँ कब तक फ़िज़ाएं,
ये कब तक उठेगा शहर सोते-सोते ।

मैँ ऐसे में 'हर्षा' क्यों जालिम न बनता,
ज़हर हो गया हूँ  ज़हर ढोते-ढोते ।

हर्ष महाजन

बहर
122-122-122-122